माँ , एक कड़ी
रिश्तों की
भरा -पूरा बड़ा
एवं संयुक्त परिवार
| बड़ा ,बहुत बड़ा
दो मंजिला घर | घर,
जी हाँ सचमुच
घर ही तो
था वह , जहाँ
माँ का रौब
-रुतबा घर
के सदस्यों पर ही
नहीं बल्कि घर
की प्रत्येक निर्जीव
वस्तुओं पर भी
साफ़ झलकता था
| उनका व्यक्तित्व ही कुछ
ऐसा था जो
न चाहते हुए
भी सामने वाले
को बरबस अपनी
ओर आकर्षित कर
लेता था | धर्म-कर्म में
अति से अधिक
विश्वास करने वाली
,जीवन को अपनी
शर्तों पर जीने
वाली ,सुंदर- सुशील ,कर्मठ
एवं परिवार को
पूर्ण समर्पित गृहणी
थीं | अपने बच्चों
के हर संकट
को दूर करने
के लिए लड़
जाती ईश्वर से
और तब-तक हार नहीं मानती जब-तक
मनोकामना पूरी न
होती | विवाह के कई
वर्ष गुजर जाने
के बाद भी
जब बेटी
की गोद न
भरी तो ईश्वर
से प्रार्थनाओं ,कर्मकांडों का अनवरत
सिलसिला चल पड़ा
| जब गोद में
स्वस्थ एवं सुंदर
बालक आया तो
ईश्वर के प्रति
कृतञता भी
व्यक्त की पूरे
निश्छल मन से
|
धीरे-धीरे सभी
बच्चों का विवाह
हो गया | सभी
अपनी-अपनी घर
-गृहस्थी में व्यस्त
रहने लगे | माँ
भी अपनी जिम्मेदारियों
से मुक्त होने
लगीं | सभी बेटे
-बेटियों के भी
बाल-बच्चे हो
गए | घर में
खूब रौनक रहती
| भरे-पूरे परिवार
को देख-देख
माँ बहुत प्रसन्न
होती |किन्तु सुख-दुःख कब
स्थिर रहे हैं|
ये तो आते
-जाते रहते हैं
| बेटे ज़मीन-जायदाद एवं संपत्ति
को लेकर न
जाने क्या-क्या
सपने देखते थे,
सो उनके और
उनकी पत्नियों के
बीच पहले तो
मन-मुटाव फिर
धीरे-धीरे दुश्मनी
होने लगी | माता-पिता के
सामने लज्जा का
एक झीना सा
पर्दा था ,अन्यथा
संपत्ति के प्रति
लालच की भावना
इतनी प्रबल थी
कि येन-केन
प्रकारेण झपटना चाहते थे
| पिता घर के
मुखिया केवल नाम
के थे | कौन
सुनता था किसी
की |
माँ पिता के
साथ रात -रात
भर जागती ,मंथन
करती कि कैसे
बेटों के बीच
की खाई को
भरे ,प्रयास करती
कि क्या करें
कि बेटों के बीच
आपसी -प्यार बढ़े
| बढ़े नहीं तो
कम से कम जितना
है, उतना तो
स्थिर रहे|
बड़ा गर्व था
उन्हें अपने बच्चों
पर | शायद किसी
की बुरी नजर
लग गई थी
परिवार को | हर
समय मुस्कुराने वाली
सदैव सबकी ओर
सहायता का हाथ
बढ़ाने वाली माँ
अपने पति का साथ
होते हुए भी
स्वयं को असहाय
महसूस करती | सोचती रहती कि ऐसा
क्या करे कि
घर फिर से
घर बन जाए
| किन्तु संपत्ति के लालच का
भूत था कि बेटों के सिर
से उतरने का
नाम ही नहीं
लेता था | पिता
ने बहुत प्रयास
किये अंततः हार
गए | संतान और
संपत्ति की जंग
में जिंदगी
से भी हार
गए |
विपत्तियों का पहाड़
टूट पड़ा था
माँ पर | माँ
तो जैसे अकेली
पड़ गई | फिर
भी एक मजबूत
कड़ी थी | पिता
के जाने के
बाद भी सभी
बेटियों को तीज
-त्यौहार पर बुलाना
, जवाइयो को मान-सम्मान देना | एक
सिलसिला चल पड़ा
था रिश्तों को
जोड़े रखने का
| माँ ही तो
उनकी मजबूत कड़ी थी
| समय ने एक
बार फिर करवट
ली | बेटों के
बीच की
दरार अब तक
खाई बन चुकी
थी | अब
न तो किसी
को किसी की
शर्म थी न
छोटे-बड़े का
लिहाज | किसी भी
रिश्तों के प्रति
सम्मान तो बिक
चुका था| बेटियों
-जवाइयो को अपने
अपने पक्ष में बुलवाने के
लिए झूठ का
सहारा लिया जाता
l इस
प्रकार बेटियों के भी
आपस में मन
विभाजित हो गए
| आखिरकार माँ ने
भी बिस्तर पकड़ लिया
| पहले तो बहुओं
ने फिर बेटों
ने भी माँ
से किनारा कर
लिया | रिश्तों की अटूट
कड़ी अब तक
बहुत कमजोर हो
चुकी थी | केवल
साँसे शेष थीं
| माँ की एक
झलक पाने ,उन्हें
जी भर देखने
का मोह बेटियों
को जब-तब
पीहर की देहरी
पर खड़ा कर
देता | क्योंकि माँ एक
मेग्नेटिक कड़ी थीं
इस अनमोल रिश्ते
की जो आहत
मन को सब
भुलाकर मायके की चौखट
पर खींच लाती
थीं| अचानक मेग्नेट
की शक्ति
समाप्त हो गई
और रिश्तों की
वह अटूट कड़ी
......................टूट गई | बिखर
गए सारे मोती
, टूट गए सारे
रिश्ते |
रिश्तों की बगिया को उजाड़ विरवान जंगल में जीने को अकेला छोड़ दिया | मन पछताता है , क्यों लालच किया ,क्यों छोड़ा अपनों को पैसे की खातिर | लक्ष्मी तो चलायमान है ,कल किसी थी, आज मेरी है तो कल किसी और की होगी | पर रिश्ते जो कल भी मेरे थे आज भी मेरे हैं और कल भी रहेंगे | बस जरूरत है तो इस पर जमी धूल को झाड़ने की ,इन्हें सजाने-सँवारने की | टूटी कड़ी को पुनः जोड़ने की | अपने लिए भी और माँ को श्रद्धांजलि के रूप में ही सही क्योंकि माँ ही तो थी इन रिश्तों की कड़ी |
सबके मन व्यथित हैं
, सब ताक रहे हैं
एक दूसरे की ओर
कि कौन बनेगा
कड़ी को जोड़ने
का पहला कुंडा
| छोड़ दो अहम् को तोड़ तो इस दीवार को, इसी ऊहापोह में कहीं देर न
हो जाए , जीवन
की सांझ में
|
जिसके पास रिश्तों की पूंजी , वही इंसान धनवान है
अहम् और पैसे के कारण,जिसने रिश्ता तोडा,
वह धन होते हुए भी कंगाल है |
बिखरते रिश्तों को जोड़ने की एक कड़ी , मेरी यह कहानी माँ एक कड़ी रिश्तों की
जिसके पास रिश्तों की पूंजी , वही इंसान धनवान है
अहम् और पैसे के कारण,जिसने रिश्ता तोडा,
वह धन होते हुए भी कंगाल है |
बिखरते रिश्तों को जोड़ने की एक कड़ी , मेरी यह कहानी माँ एक कड़ी रिश्तों की
