Tuesday, 19 July 2016

                       माँ , एक कड़ी रिश्तों की
भरा -पूरा बड़ा एवं संयुक्त परिवार | बड़ा ,बहुत बड़ा दो मंजिला घर | घर, जी हाँ सचमुच घर ही तो था वह , जहाँ माँ का रौब -रुतबा  घर के सदस्यों  पर ही नहीं बल्कि घर की प्रत्येक निर्जीव वस्तुओं पर भी साफ़ झलकता था | उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था जो चाहते हुए भी सामने वाले को बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेता था | धर्म-कर्म में अति से अधिक विश्वास करने वाली ,जीवन को अपनी शर्तों पर जीने वाली ,सुंदर- सुशील  ,कर्मठ एवं परिवार को पूर्ण समर्पित गृहणी थीं | अपने बच्चों के हर संकट को दूर करने के लिए लड़ जाती ईश्वर से और तब-तक हार नहीं मानती जब-तक  मनोकामना पूरी होती | विवाह के कई वर्ष गुजर जाने के बाद भी जब  बेटी की गोद भरी तो ईश्वर से प्रार्थनाओं ,कर्मकांडों  का  अनवरत सिलसिला चल पड़ा | जब गोद में स्वस्थ एवं सुंदर बालक आया तो ईश्वर के प्रति कृतञता  भी व्यक्त की पूरे निश्छल मन से |
धीरे-धीरे सभी बच्चों का विवाह हो गया | सभी अपनी-अपनी घर -गृहस्थी में व्यस्त रहने लगे | माँ भी अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने लगीं | सभी बेटे -बेटियों के भी बाल-बच्चे हो गए | घर में खूब रौनक रहती | भरे-पूरे परिवार को देख-देख माँ बहुत प्रसन्न होती |किन्तु सुख-दुःख कब स्थिर रहे हैं| ये तो आते -जाते रहते हैं | बेटे  ज़मीन-जायदाद एवं संपत्ति को लेकर जाने क्या-क्या सपने देखते थे, सो उनके और उनकी पत्नियों के बीच पहले तो मन-मुटाव फिर धीरे-धीरे दुश्मनी होने लगी | माता-पिता के सामने लज्जा का एक झीना सा पर्दा था ,अन्यथा संपत्ति के प्रति लालच की भावना इतनी प्रबल थी कि येन-केन प्रकारेण झपटना चाहते थे | पिता घर के मुखिया केवल नाम के थे | कौन सुनता था किसी की |
माँ पिता के साथ रात -रात भर जागती ,मंथन करती कि कैसे बेटों के बीच की खाई को भरे ,प्रयास करती कि क्या करें कि बेटों के बीच आपसी -प्यार बढ़े | बढ़े नहीं तो कम से  कम जितना है, उतना तो स्थिर  रहे| बड़ा गर्व था उन्हें अपने बच्चों पर | शायद किसी की बुरी नजर लग गई थी परिवार को | हर समय मुस्कुराने वाली सदैव सबकी ओर सहायता का हाथ बढ़ाने वाली माँ अपने पति का  साथ होते हुए भी स्वयं को असहाय महसूस करती | सोचती रहती  कि ऐसा क्या करे कि घर फिर से घर बन जाए | किन्तु संपत्ति के लालच  का भूत था  कि बेटों के सिर से उतरने का नाम ही नहीं लेता था | पिता ने बहुत प्रयास किये अंततः हार गए | संतान और संपत्ति की जंग में  जिंदगी से भी हार गए |
 विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा था माँ परमाँ तो जैसे अकेली पड़ गई | फिर भी एक मजबूत कड़ी थी | पिता के जाने के बाद भी सभी बेटियों को तीज -त्यौहार पर बुलाना ,  जवाइयो को मान-सम्मान देना | एक सिलसिला चल पड़ा था रिश्तों को जोड़े रखने का | माँ ही तो उनकी मजबूत कड़ी थी | समय ने एक बार फिर करवट ली | बेटों के बीच  की दरार अब तक खाई बन चुकी थीअब तो किसी को किसी की शर्म थी छोटे-बड़े का लिहाज | किसी भी रिश्तों के प्रति सम्मान तो बिक चुका था| बेटियों -जवाइयो को अपने अपने पक्ष में बुलवाने  के लिए झूठ का सहारा लिया जाताइस प्रकार बेटियों के भी आपस में मन विभाजित हो गए | आखिरकार माँ ने भी बिस्तर  पकड़ लिया | पहले तो बहुओं ने फिर बेटों ने भी माँ से किनारा कर लिया | रिश्तों की अटूट कड़ी अब तक बहुत कमजोर हो चुकी थी | केवल साँसे शेष थीं | माँ की एक झलक पाने ,उन्हें जी भर देखने का मोह बेटियों को जब-तब पीहर की देहरी पर खड़ा कर देता | क्योंकि माँ एक मेग्नेटिक कड़ी थीं इस अनमोल रिश्ते की जो आहत मन को सब भुलाकर मायके की चौखट पर खींच लाती थीं| अचानक मेग्नेट की  शक्ति समाप्त हो गई और रिश्तों की वह अटूट कड़ी ......................टूट गई | बिखर गए सारे मोती , टूट गए सारे रिश्ते |
 आज सारे सुख हैं ,धनदौलत है , नहीं  है ,तो केवल रिश्तों की पूंजी | स्वयं का परिवार है किन्तु मन जिंदगी के दो राहे पर अकेला भटक रहा है  ,ढूंढते हैं सब उन्हीं पलों को , तलाशते  हैं उन  अनमोल यादों को, खो जाना चाहते हैं उनमें , जी लेना चाहते हैं फिर से उसे | काश ! यह सब संभव हो पाता | उस कड़ी के अस्तित्त्व के महत्त्व को पहचाना होता |  पैसे के लालच ने अकेला कर दिया | अहम् ने कहीं का न छोड़ा , नितांत अकेला कर दिया | 

रिश्तों की बगिया को उजाड़ विरवान जंगल में जीने को अकेला छोड़ दिया | मन पछताता है , क्यों लालच किया ,क्यों छोड़ा अपनों को पैसे की खातिर | लक्ष्मी तो चलायमान है ,कल किसी थी, आज मेरी है तो कल किसी और की  होगी | पर रिश्ते जो कल भी मेरे थे आज भी मेरे हैं और कल भी रहेंगे | बस जरूरत है तो इस पर जमी धूल को झाड़ने की ,इन्हें सजाने-सँवारने की | टूटी कड़ी को पुनः जोड़ने की | अपने लिए भी और माँ को श्रद्धांजलि के रूप में ही सही क्योंकि माँ ही तो थी इन रिश्तों की कड़ी |


सबके मन व्यथित हैं , सब ताक रहे हैं एक दूसरे की ओर कि कौन बनेगा कड़ी को जोड़ने का पहला कुंडा | छोड़ दो अहम् को तोड़ तो इस दीवार को, इसी ऊहापोह में कहीं  देर हो जाए , जीवन की सांझ में |

 जिसके पास रिश्तों की पूंजी , वही इंसान धनवान है

अहम् और पैसे  के कारण,जिसने रिश्ता तोडा,
वह धन होते हुए भी कंगाल है |


बिखरते रिश्तों को जोड़ने की एक कड़ी , मेरी यह कहानी  माँ एक कड़ी रिश्तों की