Saturday, 4 March 2017

                           एक प्रयास ऐसा भी (कहानी)
पड़ोस में रहने वाली प्रज्ञा के घर से रोज ही बच्चे  के रोने की , बुजुर्गों को मिलने वाली नसीहतों की और घर में काम  करने वाली क्षमा दीदी को दिनभर क्या-क्या करना है , बेटे को क्या खिलाना है, कब नहलाना है ,कब सुलाना है, माँ–बाबूजी को क्या खाना देना है,कब कौन सी दवाई देनी है आदि आदि निर्देशों की आवाजें रोज सुबह-सुबह आतीं हैं | प्रज्ञा मल्टी नॅशनल कम्पनी में उच्च पद पर है ,उसका पति प्रवीन भी सरकारी नौकरी में है | दोनों पति पत्नी अच्छा  पैसा कमाते  हैं | दोनों की कमाई तो अच्छी हो रही है ,पैसे की कमी नहीं है बस यदि कमी है तो रिश्तों में आत्मीयता की |
रानी रोज-रोज यह सब देखती –सुनती तो उसका मन बड़ा ही विचलित हो जाता | एक दिन उसके मन की उथल-पुथल कुछ अधिक ही बढ़ गई | वह बड़ी ही गंभीरता से विचार करने लगी | अचानक उसके कानों में टी वी पर आते डायपर के विज्ञापन की आवाज पड़ी ,उसका तो मानो मन ही खिल उठा, जैसे उसे समाधान के पिटारे की चाबी मिल गई | वह इन डायपरस के इर्द-गिर्द समस्या का समाधान ढूंढने लगी | रानी सोच रही थी कि प्रज्ञा बेटे को दिन-रात डायपर पहनाकर रखती है | उसके जाने के बाद क्षमा कितनी बार चेक करती है कि बेटा कहीं गंदगी में तो नहीं है | यह प्रज्ञा को बिलकुल नहीं पता | क्षमा भी क्या करे ,सारे घर की और घर के हर सदस्य की जिम्मेवारी उसी की है | आखिर वह भी तो इंसान है ,उसका भी तो घर-परिवार है |
डेढ़ साल का बेटा है प्रज्ञा का | इन डायपरस में ये मासूम कितना झेलता है अपनी ही गंदगी को | रानी का दिमाग भन्ना रहा था | स्वर्ग-नरक की बातें उसे भ्रमित कर उसके दिमाग पर लगातार चोट कर रही थीं कि कितनी कठिनाइयों को झेलकर माँ एक बच्चे को जन्म देती है | माँ के उदर में शिशु भी तो कितने कष्ट में रहता है , उल्टा लटका रहता है और सभी तरह के कष्ट झेलने के पश्चात नौ माह बाद संसार में जन्म लेता है | और फिर सिलसिला शुरू हो जाता है इन डायपरस के साथ जीने का | कामकाजी महिलाएँ इतनी अभ्यस्त हैं इन डायपरस के प्रयोग  की कि दिन हो या रात बेचारे शिशु को इनसे छुटकारा नहीं मिलता | वह कहे भी तो कैसे उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता अभी विकसित नहीं हुई है | एक गंदगी से निकलकर बेचारा दूसरे दल-दल में जा फंसा है | न जाने ऐसे कितने ही प्रश्न रानी को व्यथित कर रहे थे | वह सोचने लगी हमारा ही समय ही अच्छा था कि हम अपने बच्चों को कपड़े से बनी मुलायम नैपी पहनाते थे और गीली होने पर तुरंत बदल देते थे | नैपी बदलना एक काम अवश्य था किन्तु इस बहाने माँ का स्पर्श कितनी सुखद अनुभूति देता था शिशु को | दोनों का रिश्ता दिनोंदिन मजबूत होता जाता था | दोनों के बीच निरंतर एक मूक संवाद तथा प्यार का आदान-प्रदान होता था | शिशु पूरी तरह से माँ पर आश्रित होता है किन्तु जब तक माँ का समर्पण नहीं होगा यह रिश्ता खोखला ही रहेगा | बार-बार माँ का स्पर्श ,उसकी आवाज , उसकी आहट ,सबका पता होता है शिशु को | माँ के स्पर्श के साथ ही माँ-बच्चे में एक गहरा नाता जुड़ जाता है | अपने हाथों से नहलाना ,कपड़े पहनाना ,खाना खिलाना ,लोरी सुनाकर सुलाना ,बार-बार प्यार से चूमना ,जरा सा रोने पर गोद में उठा कर सर पर प्यार से हाथ फेरना | ऐसी ही न जाने कितनी ही बातें माँ-बच्चे के बीच अटूट रिश्ता बना देती थीं | एक दूसरे  को बिलकुल नजदीक ला देती थीं | इतनी कि दोनों को एक दूसरे बिना अधूरा बना देती थी | और आज का जमाना रानी सोच रही थी  बाप रे! क्या है | सिर्फ मशीन बनकर रह गई  है माँ , पैसे कमाने की मशीन | अपनी ममता लुटाने के बजाय आया की गोद दे दी | आया को अपनी तनख्वाह से मतलब है न कि बच्चे की सही देखभाल से | माँ की अनुपस्थिति में जब बच्चा रोता है तो उसे डांट-डपटकर जबदस्ती चुप कराती है | उसके पास माँ के जैसी कोमल भावनाओं का ममता भरा स्पर्श नहीं होता ,जो बच्चे को भावनात्मक रूप से सपोर्ट कर मानसिक शांति दे सके | उसे अहसास करा  पाए कि बेटा चुप हो जा तेरी माँ तेरे साथ है | गंद से भरे डायपर में बच्चे की छटपटाहट का पता ही नहीं चलता कि वो कहने की कोशिश में है कि इस गंदगी से मुझे मुक्त करो | ऐसे कितने ही किस्से हैं भावनाओं से जुड़े | आज समाज में क्या दे रहीं हैं माएँ अपने बच्चों को | हाँ एक बात सौ प्रतिशत सही है कि आप जो देते हैं वही बढ़कर आपको वापस मिलता है | कहते हैं न कि “बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से पायें |”  सही बात है आज हम जो अपने बच्चों को डायपर पहना रहे हैं तो कोई बड़ी बात नहीं होगी यदि भविष्य में वो हमें पहनाएँ | क्योंकि बचपन और बुढ़ापा एक-दूसरे के पर्याय हैं | हे भगवान ! यह सब सोच-सोचकर रानी की बैचैनी बढती ही जा रही है | इस युग में हमने पाश्चात्य संस्कृति को अपनाकर जो भूल की है वह आज हमारे सामने एकाकी परिवार और वृद्धाश्रम के रूप में है | हम चाहते तो हैं बहुत कुछ करना पर होता कुछ और ही है | कुछ भी सहज नहीं है ,सब कुछ बनावटी है | आज हमारे पास बच्चों के लिए समय नहीं है कल उनके पास हमारे लिए नहीं होगा तब कोसने का क्या लाभ होगा | बस आज सुधारो ,कल अपने आप सुधर जाएगा |

मन में उठते इन बवंडरों के साथ रानी बड़े ही पशोपेश में थी | अचानक वह उठ खड़ी हुई एक नए संकल्प के साथ कि वह महिला मंडल के साथ इस विषय पर चर्चा करेगी और बच्चों और बुजुर्गों के प्रति प्रेम और सौहार्द की अलख जगाएगी | नई पीढ़ी को सुधारने हेतु उसकी महिला मंडली कदम उठाएगी , बिखरते-टूटते परिवारों तथा रिश्तों को सहेजने का प्रयास करेगी | भले ही यह कदम छोटा होगा ,किन्तु इसके परिणाम दूरगामी तथा सुखद ही होंगे |