पगली
-----------कौन ?
वो दूर
के रिश्ते में
मेरी ननद लगती हैं | नाम है गिरिजा | माँ पार्वती
का ही दूसरा
नाम | अपने नाम
के अनुरूप ही
उनका व्यक्तित्व | भोली
,ह्रदय से निश्छल
तथा सबसे प्रेम
करने वाली | अपने
निष्कपटी स्वभाव के कारण
ही सबको प्रिय हैं |
बचपन में
ही माँ का
आँचल छूट गया
था | बच्ची की
देखभाल अच्छे से हो
सोचकर या अपने
कर्तव्यों का भार
दूसरे को सौंपने
की परंपरा के
चलते पिता ने
दूसरा विवाह रचा
लिया | नई माँ
के आने से
गिरिजा बड़ी प्रसन्न
हुई | माँ ने
भी लाड-प्यार
में कमी न
रखी | सब ठीक
चल रहा था
| पूरा परिवार प्रसन्न
था | किन्तु विधि
का लिखा
कोई पढ़ पाया
है , कोई जान
पाया है उसकी
मर्जी |
समय ने करवट
ली | नई माँ
ने एक सुंदर-स्वस्थ्य बालक को
जन्म दिया | गिरिजा
की ख़ुशी का
ठिकाना ही न
रहा | अब तो
उसके साथ खेलने
वाला ,उससे राखी
बँधवाने वाला , भाई -दूज
पर टीका करवाने
वाला अपना स्वयं
का भाई जो
आ गया था
| अब उसे किसी
की परवाह नहीं
थीं | हमेशा अपने
भाई के साथ
व्यस्त रहती ,उसकी हर
ख़ुशी का ध्यान
रखती | सब कुछ
भूल चुकी थीं
गिरिजा | धीरे -धीरे विद्यालय
भी छूटने लगा
| एक-दो बार
तो माँ ने
स्मरण कराया कि
गिरिजा विद्यालय जाया करो
| मनुष्य का स्वार्थ
उससे क्या नहीं
कराता | माँ ने
भी कहना बंद
कर दिया | गिरिजा
तो जैसे पूरी
तरह से घर
में ही रच-बस गई
| बस अक्षर ज्ञान
तक ही उसकी
शिक्षा सिमट गई
| वह पूरी तरह
से माँ के
हाथों की कठपुतली
थी | कुछ वर्षों
के अंतराल पर
माँ ने एक-एक कर
दो पुत्र एवं
दो पुत्रियों को
जन्म दिया | सबकी
देखभाल तथा घर
का काम सब
गिरिजा पर आ
पड़ा | गिरिजा सब-कुछ
अच्छे से सँभाल
रही थीं | अपने
सभी भाई-बहनों
की प्रिय जीजी
थीं | बड़ा
भाई तो उस
पर जैसे जान
ही छिडकता था
| करे भी क्यों
नहीं गिरिजा ने
भी तो बहन
होते हुए भी
माँ का फ़र्ज़
निभाया था |अब गिरिजा
की आयु विवाह के योग्य
थीं | वर की
खोज आरम्भ हुई
| बस यहीं एक बार
फिर समय ने
अपना दाँव खेला
| किताबी ज्ञान के अभाव
के कारण गिरिजा के जीवन
की रूपरेखा कुछ
इस तरह लिखी
गई कि बिना डिग्री के
लड़की को कौन
ब्याहे | पिता के
मन को बड़ी
कचोट हुई , अपनी
गलती का अहसास
भी हुआ | रात-रात भर
जागते -करवटें बदलते ,अपने
आप को कोसते
| सोचते, समय रहते
चेत जाते तो
यूँ बेटी के
ब्याह को परेशान
न होना पड़ता
| खैर जैसे-तैसे
एक लड़का मिला
| परिवार नामी था ,घर-वर तो
अच्छा था पर
व्यवसाय अनुकूल न था
| उनके परिवार में सब्जी
बेचने का कार्य
होता था | यह
व्यवसाय उन लोगों
ने क्यों अपनाया
यह तो ज्ञात
नहीं ,हाँ किन्तु
लड़का गिरिजा की
ही भाँति सरल
था | सो विवाह के पश्चात दोनों
की बनने लगी
| लड़के के बड़े
भाई का विवाह
भी नहीं हो
पा रहा था
| उस घर में
गिरिजा के कदम
ऐसे पड़े कि
बड़े बेटे का
विवाह भी हो
गया | गिरिजा ने
तो अपनी सरलता
से पहले ही
सास-ससुर का
दिल जीत लिया
था किन्तु बड़े
बेटे का विवाह
होने से वे
गिरिजा को शुभ
कदम की मानने
लगे | ठीक भी
था | गिरिजा थीं
ही ऐसी जहाँ
रहती खुशियाँ बाँटती
|
सास-ससुर का
व्यवहार गिरिजा के प्रति
बहुत ही अच्छा
था | गिरिजा की
नई
जेठानी दसवीं पास थीं
, बड़ा गुरुर था
उसे , देखने में
तो अत्यंत साधारण
सी थीं , किन्तु
दसवीं के सर्टिफिकट
से उसमें अभिमान
की बू आती
थीं | वह गिरिजा
पर पूरा रौब
जमाती थीं | संयुक्त
परिवार में रहते
हुए गिरिजा पूरे
मनोयोग से अपने
कर्तव्यों का पालन
करती , और जेठानी
अपने | वह गिरिजा
को नीचा दिखाने
का कोई भी
मौका नहीं छोड़ती
| यथा समय दोनों
ने संतानों को
जन्म दिया | गिरिजा
के तीन बेटे
और एक बेटी
एवं जेठानी ने
दो बेटे एवं
एक बेटी हुई
| सभी हमउम्र थे
,बस गिरिजा का सबसे
छोटा बेटा ही
अकेला किन्तु सब
भाई- बहनों का लाडला
था |
समय का चक्र
तो चलता रहता
है, वो न
तो किसी के
सुख से सुखी
होता है न
किसी के दुःख
से दुखी | न
ही किसी के
लिए रुकता है
|गिरिजा के सास-ससुर अब
इस दुनिया में
नहीं थे | दोनों
भाइयों ने साथ
ही रहने का
संकल्प कर संयुक्त
परिवार को बिखरने
नहीं दिया | सास-ससुर के
जाने के बाद
तो जेठानी ने
पूरे घर पर
तो कब्जा कर
लिया साथ ही
गिरिजा पर भी| गिरिजा
तो जैसे उसकी
दासी थीं | गिरिजा
को यह
बात नागवार गुजरती
किन्तु पति का
मान रखते हुए
सब सह जाती|
आने -जाने वालों
के सामने जेठानी
अपनी पढ़ाई का
रौब झाड़ती ,गिरिजा
को पगली कहती
| कहते है न
कि ईश्वर एक
हाथ से लेता
है तो सौ
हाथों से देता
है | गिरिजा के
चारों बच्चे सुंदर
एवं सभ्य थे
| उच्च शिक्षा प्राप्त कर
नौकरी में उच्च
पदों पर आसीन
थे | वहीँ दूसरी
और जेठानी के
बड़े बेटे ने
लगभग तीस वर्ष
की आयु में
सी ए
की डिग्री ली
और दूसरे बेटे
ने आठवीं के
बाद पढ़ाई छोड़
आवारागर्दी शुरू कर
दी | जेठ जी
ने उस समझा
बुझाकर अपने ही
व्यवसाय (सब्जी बेचने के
) में लगा लिया
| फिर भी जेठानी
की अकड़ नहीं
गई | वह अपने
बेटों के लिए
सुंदर-सुशील वधुओं की तलाश करने
लगी तो दूसरी
ओर गिरिजा को
बच्चों के ब्याह
में तनिक भी
समस्या नहीं आई
| गिरिजा की तीनो
बहुएँ -सुंदर-सुशील एवं
सुघड़ थीं | दामाद
भी बड़े खानदान से था
|
जेठानी तो पहले
से ही जली-भुनी रहती
थीं , उससे गिरिजा की
खुशियाँ बर्दाश्त ही नहीं
होती थीं | अब
तो वह गिरिजा
को खुले आम
पगली कहकर बुलाती
थीं | गिरिजाकी बहुएँ
अपने ससुर के
भ्रातृ प्रेम के कारण
चुप रह जाती
थीं | जेठानी की
दोनों बहुएँ उसके
इस व्यवहार से
भलीभाँति परिचित थीं |उन्हें
भी अपनी सास
का चाची सास
के प्रति रवैया बिलकुल नहीं
सुहाता था | धीरे-धीरे उस
परिवार में कलह
शुरू हो गई
| दो चूल्हे हो
गए | गिरिजा की
बहुओं ने संयुक्त
परिवार की परंपरा
को कायम रखा
| जेठानी का घर
तीन टुकड़ों में
बँट गया | उनकी बहुओं
ने अपनी सास से मुँह मोड़ लिया | जिस कारण वह अभिमान करती थी वह चूर-चूर हो रहा था
|
हाँ एक बात
की चर्चा करना तो
मैं भूल ही
गई कि मेरे
पति गिरिजा जीजी
के प्रिय भाई
हैं | हालाँकि उनके
बच्चों की आयु
लगभग हमारे
ही सामान है
किन्तु वे हमें
पूरा मान-सम्मान
देती हैं | एक
दिन मैं और
मेरे पति उनके
घर के समीप
से जा रहे
थे , मेरे पति ने कहा
" चलो आज गिरिजा
जीजी से मिलकर
चलते हैं|" हम
वहाँ पहुँचे तो,
जैसा कि कालोनियों
में महिलाएँ करती
हैं ,कुछ वैसी
ही चर्चा चल
रही थी| धूप सेंकती
,मूंगफली खाती गपिया
रहीं थी | चर्चा
का विषय गिरिजा
जीजी और उनकी
जेठानी थी | एक
महिला कह रही
थी कि " बड़ी
कहती थी पगली
है -पगली
है | मुझे तो
वही पगली लगती
है |" दूसरी ने कहा
कि अरे हाँ
-"बड़ा बनती है
, देख लिया था
उसके बेटे के
ब्याह में कोई
भाई न खड़ा
था भात के
समय "
तीसरी कहती -" मुझे तो
गिरिजा के बड़े
बेटे की शादी
के बाद पता
लगा था कि
उसके भाई बहन
सौतेले हैँ | सारे भाई
-बहन कैसे जान
छिडकते हैँ गिरिजा
पर कि कोई
जान ही नहीं
सका कि वे
सगे नहीं हैँ
"| "और तो और
उसके चचेरे -ममेरे
दूर के भाई
भी द्वार पर
खड़े थे " एक
ने कहा | "गिरिजा
है ही ऐसी
सरल तभी तो
परायी जाइयों को
भी अपना बना
लिया सब खूब
मान करती हैं
उसका |" उन महिलाओं
से मेरा भी
परिचय रहा हैं
सो मैं भी
सबको नमस्ते करके
उनके साथ बैठ
गई |
जीजी की जेठानी
घर के बाहर
खटिया डालकर लेटी
सारी बात-चीत
सुन रही थीं
| उनका मन आत्मग्लानि
से भर उठा
| पश्चात्ताप के आँसू
झर रहे थे
| मन में उठते
विचारों ने तुरंत
निर्णय लिया कि
गिरिजा के पास
जाया जाए | अपने
बूढ़े तन-मन
को लगभग खीँचती
वे आँगन में
धूप सेंकती गिरिजा
जीजी के पास
पहुँची | अपने स्वभाव
के अनुकूल जीजी
ने उन्हें सम्मान
पूर्वक बिठाया | बैठते ही
जेठानी प्रायश्चित कर कहने
लगी कि "गिरिजा
मैं तुम्हें पगली
कहती थी न ,पर
सच में तो
मैं ही पगली
हूँ जो थोड़े से
किताबी ज्ञान के कारण
अभिमान कर बैठी
|" सरलहृदय जीजी बोल
उठी " न जीजी
पढाई -लिखाई का
महत्त्व तो मैंने
अपने ब्याह में
आयी कठिनाइयों से
जाना था तथा
आपके आने से
यह और दृढ
हो गया था
| "मैंने तभी संकल्प
कर लिया था
कि अपने बच्चों
को खूब पढ़ाऊंगी"
| जेठानी बोल उठी
" गिरिजा तुमने तो विद्या
के महत्त्व को बहुत पहले समझ लिया था किन्तु
मैंने रिश्तों को निभाने का तथा जीवन का पाठ आज
पढ़ा है | हो सके तो मुझे क्षमा कर देना मेरी छोटी बहन "|मैं और मेरे पति चुपचाप
खड़े दो बहनों का वार्तालाप सुन रहे थे | और सोच रहे थे कि सचमुच पगली कौन ?
हमारी तन्द्रा तब भंग
हुई जब जीजी की छोटी बहू ने हमारे पैर छूते हुए पूछा " अरे -मामाजी-मामीजी आप
कब आये "|