Friday, 23 September 2016

पगली -----------कौन ?

                          पगली -----------कौन ?
वो  दूर के रिश्ते में मेरी ननद लगती हैं | नाम  है गिरिजा | माँ पार्वती का ही दूसरा नाम | अपने नाम के अनुरूप ही उनका व्यक्तित्व | भोली ,ह्रदय से निश्छल तथा सबसे प्रेम करने वाली | अपने निष्कपटी स्वभाव के कारण ही सबको प्रिय हैं | 
बचपन में ही माँ का आँचल छूट गया था | बच्ची की देखभाल अच्छे से हो सोचकर या अपने कर्तव्यों का भार दूसरे को सौंपने की परंपरा के चलते पिता ने दूसरा विवाह रचा लिया | नई  माँ के आने से गिरिजा बड़ी प्रसन्न हुई | माँ ने भी लाड-प्यार में कमी रखी | सब ठीक चल रहा थापूरा परिवार प्रसन्न था | किन्तु विधि का  लिखा कोई पढ़ पाया है , कोई जान पाया है उसकी मर्जी |
समय ने करवट ली | नई माँ ने एक सुंदर-स्वस्थ्य बालक को जन्म दिया | गिरिजा की ख़ुशी का ठिकाना ही रहा | अब तो उसके साथ खेलने वाला ,उससे राखी बँधवाने वाला , भाई -दूज पर टीका करवाने वाला अपना स्वयं का भाई जो गया था | अब उसे किसी की परवाह नहीं थीं | हमेशा अपने भाई के साथ व्यस्त रहती ,उसकी हर ख़ुशी का ध्यान रखती | सब कुछ भूल चुकी थीं गिरिजा | धीरे -धीरे विद्यालय भी छूटने लगा | एक-दो बार तो माँ ने स्मरण कराया कि गिरिजा विद्यालय जाया करो | मनुष्य का स्वार्थ उससे क्या नहीं कराता | माँ ने भी कहना बंद कर दिया | गिरिजा तो जैसे पूरी तरह से घर में ही रच-बस गई | बस अक्षर ज्ञान तक ही उसकी शिक्षा सिमट गई | वह पूरी तरह से माँ के हाथों की कठपुतली थी | कुछ वर्षों के अंतराल पर माँ ने एक-एक कर दो पुत्र एवं दो पुत्रियों को जन्म दिया | सबकी देखभाल तथा घर का काम सब गिरिजा पर पड़ा | गिरिजा सब-कुछ  अच्छे से सँभाल रही थीं | अपने सभी भाई-बहनों की प्रिय जीजी थींबड़ा भाई तो उस पर जैसे जान ही छिडकता था | करे भी क्यों नहीं गिरिजा ने भी तो बहन होते हुए भी माँ का फ़र्ज़ निभाया था |अब  गिरिजा की आयु विवाह के योग्य थीं | वर की खोज आरम्भ हुई | बस यहीं  एक बार फिर समय ने अपना दाँव खेला | किताबी ज्ञान के अभाव के कारण  गिरिजा के जीवन की रूपरेखा कुछ इस तरह लिखी गई कि  बिना डिग्री के लड़की को कौन ब्याहे  | पिता के मन को बड़ी कचोट हुई , अपनी गलती का अहसास भी हुआ | रात-रात भर जागते -करवटें बदलते ,अपने आप को कोसते | सोचते, समय रहते चेत जाते तो यूँ बेटी के ब्याह को परेशान होना पड़ता | खैर जैसे-तैसे एक लड़का मिलापरिवार नामी था ,घर-वर तो अच्छा था पर व्यवसाय अनुकूल था | उनके परिवार में सब्जी बेचने का कार्य होता था | यह व्यवसाय उन लोगों ने क्यों अपनाया यह तो ज्ञात नहीं ,हाँ किन्तु लड़का गिरिजा की ही भाँति सरल था | सो विवाह के पश्चात दोनों की बनने लगी | लड़के के बड़े भाई का विवाह भी नहीं हो पा रहा था | उस घर में गिरिजा के कदम ऐसे पड़े कि बड़े बेटे का विवाह भी हो गया | गिरिजा ने तो अपनी सरलता से पहले ही सास-ससुर का दिल जीत लिया था किन्तु बड़े बेटे का विवाह होने से वे गिरिजा को शुभ कदम की मानने लगे | ठीक भी था | गिरिजा थीं ही ऐसी जहाँ रहती खुशियाँ बाँटती
सास-ससुर का व्यवहार गिरिजा के प्रति बहुत ही अच्छा था | गिरिजा की  नई जेठानी दसवीं पास थीं , बड़ा गुरुर था उसे , देखने में तो अत्यंत साधारण सी थीं , किन्तु दसवीं के सर्टिफिकट से  उसमें  अभिमान की बू आती थीं | वह गिरिजा पर पूरा रौब जमाती थीं | संयुक्त परिवार में रहते हुए गिरिजा पूरे मनोयोग से अपने कर्तव्यों का पालन करती , और जेठानी अपने | वह गिरिजा को नीचा दिखाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती | यथा समय दोनों ने संतानों को जन्म दिया | गिरिजा के तीन बेटे और एक बेटी एवं जेठानी ने दो बेटे एवं एक बेटी हुई | सभी हमउम्र थे ,बस गिरिजा का सबसे छोटा बेटा ही अकेला किन्तु सब भाई- बहनों का लाडला था |
समय का चक्र तो चलता रहता है, वो तो किसी के सुख से सुखी होता है किसी के दुःख से दुखी | ही किसी के लिए रुकता है |गिरिजा  के सास-ससुर अब इस दुनिया में नहीं थे | दोनों भाइयों ने साथ ही रहने का संकल्प कर संयुक्त परिवार को बिखरने नहीं दिया | सास-ससुर के जाने के बाद तो जेठानी ने पूरे घर पर तो कब्जा कर लिया साथ ही गिरिजा पर भी|   गिरिजा तो जैसे उसकी दासी थीं | गिरिजा को  यह बात नागवार गुजरती किन्तु पति का मान रखते हुए सब सह जाती| आने -जाने वालों के सामने जेठानी अपनी पढ़ाई का रौब झाड़ती ,गिरिजा को पगली कहती | कहते है कि ईश्वर एक हाथ से लेता है तो सौ हाथों से देता है | गिरिजा के चारों बच्चे सुंदर एवं सभ्य थे | उच्च शिक्षा प्राप्त कर नौकरी में उच्च पदों पर आसीन थे | वहीँ दूसरी और जेठानी के बड़े बेटे ने लगभग तीस वर्ष की आयु में सी  की डिग्री ली और दूसरे बेटे ने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ आवारागर्दी शुरू कर दी | जेठ जी ने उस समझा बुझाकर अपने ही व्यवसाय (सब्जी बेचने के ) में लगा लिया | फिर भी जेठानी की अकड़ नहीं गई | वह अपने बेटों के लिए सुंदर-सुशील वधुओं की तलाश करने लगी तो दूसरी ओर गिरिजा को बच्चों के ब्याह में तनिक भी समस्या नहीं आई | गिरिजा की तीनो बहुएँ -सुंदर-सुशील एवं सुघड़ थीं | दामाद भी बड़े  खानदान से था |
जेठानी तो पहले से ही जली-भुनी रहती थीं ,  उससे गिरिजा की खुशियाँ बर्दाश्त ही नहीं होती थीं | अब तो वह गिरिजा को खुले आम पगली कहकर बुलाती थींगिरिजाकी बहुएँ अपने ससुर के भ्रातृ प्रेम के कारण चुप रह जाती थीं | जेठानी की दोनों बहुएँ उसके इस व्यवहार से भलीभाँति परिचित थीं |उन्हें भी अपनी सास का चाची सास के प्रति  रवैया बिलकुल नहीं सुहाता था | धीरे-धीरे उस परिवार में कलह शुरू हो गई | दो चूल्हे हो गए | गिरिजा की बहुओं ने संयुक्त परिवार की परंपरा को कायम रखा | जेठानी का घर तीन टुकड़ों में बँट गया | उनकी बहुओं ने अपनी सास से मुँह मोड़ लिया | जिस कारण वह अभिमान करती थी वह चूर-चूर हो रहा था |
हाँ एक बात की चर्चा करना  तो मैं भूल ही गई कि मेरे पति गिरिजा जीजी के प्रिय भाई हैं | हालाँकि उनके बच्चों की आयु लगभग  हमारे ही सामान है किन्तु वे हमें पूरा मान-सम्मान देती हैं | एक दिन मैं और मेरे पति उनके घर के समीप से जा रहे थे ,  मेरे पति ने  कहा " चलो आज गिरिजा जीजी से मिलकर चलते हैं|" हम वहाँ पहुँचे तो, जैसा कि कालोनियों में महिलाएँ करती हैं ,कुछ वैसी ही चर्चा चल रही थी| धूप  सेंकती ,मूंगफली खाती गपिया रहीं थी | चर्चा का विषय गिरिजा जीजी और उनकी जेठानी थी | एक महिला कह रही थी कि " बड़ी कहती थी पगली है  -पगली है | मुझे तो वही पगली लगती है |" दूसरी ने कहा कि अरे हाँ -"बड़ा बनती है , देख लिया था उसके बेटे के ब्याह में कोई भाई खड़ा था भात के समय "
तीसरी कहती -" मुझे तो गिरिजा के बड़े बेटे की शादी के बाद पता लगा था कि उसके भाई बहन सौतेले हैँ | सारे भाई -बहन कैसे जान छिडकते हैँ गिरिजा पर कि कोई जान ही नहीं सका कि वे सगे नहीं हैँ "| "और तो और उसके चचेरे -ममेरे दूर के भाई भी द्वार पर खड़े थे " एक ने कहा | "गिरिजा है ही ऐसी सरल तभी तो परायी जाइयों को भी अपना बना लिया सब खूब मान करती हैं उसका |" उन महिलाओं से मेरा भी परिचय रहा हैं सो मैं भी सबको नमस्ते करके उनके साथ बैठ गई |
जीजी की जेठानी घर के बाहर खटिया डालकर लेटी सारी बात-चीत सुन रही थीं | उनका मन आत्मग्लानि से भर उठा | पश्चात्ताप के आँसू झर रहे थे | मन में उठते विचारों ने तुरंत निर्णय लिया कि गिरिजा के पास जाया जाए | अपने बूढ़े तन-मन को लगभग खीँचती वे आँगन में धूप सेंकती गिरिजा जीजी के पास पहुँची | अपने स्वभाव के अनुकूल जीजी ने उन्हें सम्मान पूर्वक बिठाया | बैठते ही जेठानी प्रायश्चित कर कहने लगी कि "गिरिजा मैं तुम्हें पगली कहती थी ,पर सच में तो मैं ही पगली हूँ जो थोड़े  से किताबी ज्ञान के कारण अभिमान कर बैठी |" सरलहृदय जीजी बोल उठी " जीजी पढाई -लिखाई का महत्त्व तो मैंने अपने ब्याह में आयी कठिनाइयों से जाना था तथा आपके आने से यह और दृढ हो गया था | "मैंने तभी संकल्प कर लिया था कि अपने बच्चों को खूब पढ़ाऊंगी" | जेठानी बोल उठी " गिरिजा तुमने तो विद्या के महत्त्व को बहुत पहले समझ लिया था किन्तु मैंने  रिश्तों को निभाने का तथा जीवन का पाठ आज पढ़ा है | हो सके तो मुझे क्षमा कर देना मेरी छोटी बहन "|मैं और मेरे पति चुपचाप खड़े दो बहनों का वार्तालाप सुन रहे थे | और सोच रहे थे कि सचमुच पगली कौन ?

हमारी तन्द्रा तब भंग हुई जब जीजी की छोटी बहू ने हमारे पैर छूते हुए पूछा " अरे -मामाजी-मामीजी आप कब आये "|

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  3. कहानी में स्वीकार किया गया हैं कि जीवन की पाठशाला में पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं तथा रिश्तों की गरिमा का पठन-पाठन भी होना अनिवार्य है |

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