Saturday, 18 February 2017

                        काव्य –कथा 
                      अनूठे मित्र 
सचिन नाम का था एक बंदर ,
गलती से ,
घुस आया कालोनी के अंदर
वहाँ ,😀
हरा-भरा पार्क था सुंदर ,
ऊँचे-बड़े फलदार पेड़ देख,
लालच आया उसके अंदर ,
उसने ,
लोगों को बैठे जब देखा
कुछ सकुचाया , औ घबराया
छिप बैठा घने पेड़ के अंदर
हो चली थी सुबह से दोपहर
भूखा था ,
पर उसने किया नियंत्रण
दिया दिलासा अपने आप को
घर जायेंगे जब मानव सारे
चैन से खायेगा फल खूब सारे
यही सोच,
हो चली अब शाम
भूख ने उसको किया हताश
बार-बार सोचे यह बात ,
उसको जाने दो , तब तोडूंगा |
अरे ! अब ये आ गया !
इसको भी जाने दो तब खाऊंगा
पर,
आना-जाना थमा नहीं ,
बढ़ी भूख पर रुकी नहीं |
उफ़! यह क्या ?
बच्चों की टोली भी आई
धमा-चौकड़ी खूब मचाई
गेंद को सब-मिल खूब उछालें
इधर से मारें उधर से मारें
अ र र र र र र यह क्या !
सरपट आई सचिन के पास
खो बैठा वह होश-हवास
वापस उसने गेंद उछाली
बच्चों की टोली पर मारी
सब बच्चे थे खूब शरारती
पर,
बंदर देख टोली सकपकाई
रोहित सबसे नटखट बालक
पलक झपकते चढ़ा पेड़ पर
हाथ बढ़ाया तरफ सचिन के
पूछ रहा था दोस्त बनोगे ?
भूख से मारा , सचिन बेचारा
सोच रहा था छूट गया घर
माता-पिता भी छूट गए
न कोई मित्र न कोई बंधु
कैसा होगा इनका साथ ?
यही सोच भर आये आँसू
नटखट था रोहित ,
पर समझदार भी था बहुत
मन की पीड़ा भाँपी उसने
समझा दर्द बेजुबान वानर का
प्यार से थामा हाथ सचिन का
उतार पेड़ से दिया खाने को
बच्चा टोली हो गई उसकी
वो हो गया बच्चा टोली का
पर,
मन में तड़प थी ,था एकाकीपन
दूर भटक बिछड़ा अपनों से
सोच रहा था , ये सब बातें
अनायास आवाज थी आई
मानो माँ ने उसे पुकारा
भूल गया वो दर्द ही सारा
उछला-कूदा , दौड़ा-भागा
हो गया अपने झुण्ड में शामिल
माँ से चिपक गया था ऐसे
जैसे बिछड़ा था बरसों से
चूम रही थी माँ भी उसको
झूम रही थी बच्चा टोली
सचिन पास था माँ के अपनी |
ये निरीह प्राणी भी रहते हैं परिवार में
बिछड़ जाए यदि इनका कोई
बस शब्द नहीं होते हैं
पर,
ये भी हमारी तरह ही रोते हैं
समझो इन्हें भी अपने जैसा
जगत लगेगा मीठे सपने सा |




Friday, 17 February 2017

                                 बहादुर रमती
रमती अपने माता-पिता की एकमात्र संतान है | वह बड़ी ही होनहार  एवं बहादुर बच्ची है | माँ नैनी तथा पिता गोपी की संतान रमती अपने नाम के अनुरूप ही सबके ह्रदय में रमती है | जब नैनी ने रमती को जन्म दिया था तभी गोपी से वचन लिया था कि हम अपनी बेटी को खूब पढ़ाएंगे और रमती का कोई भाई-बहन नहीं होगा | अतः रमती अकेली है | रमती के माता-पिता निरक्षर हैं | फिर भी अपने वचन के अनुसार उन्होंने रमती का दाखिला गाँव के विद्यालय में करवा दिया | रमती शुरू से ही मेधावी छात्रा थी वह पढाई के अलावा विद्यालय में होने वाली हर गतिविधि में भाग लेती और पुरस्कार भी जीतती | माता-पिता अपनी पुत्री की सफलता देख-देखकर फूले न समाते | धीरे-धीरे रमती बड़ी हो रही थी | गाँव में कोई भी अच्छा चिकित्सालय नहीं है | रमती को यह बात बड़ी कचोटती है कि गाँव के हर व्यक्ति को छोटी-छोटी बीमारी की चिकित्सा के लिए पास के शहर में जाना पड़ता है | रमती ने डॉ बनकर मानव सेवा करने का निश्चय किया | गाँव से शहर जाने के लिए न तो पक्की सड़क है न ही कोई यातायात का ऐसा साधन जो जल्दी ही हस्पताल पहुंचा दे | प्रगतिशील देश होने के बाद भी उसके गाँव की ऐसी दशा है | हाँ एक बात अच्छी है कि उसके विज्ञान के अध्यापक बहुत ही सुलझे विचारों के हैं | वे अपने छात्रों को नई दिशा देने का भरसक प्रयास करते हैं | उन्हीं के प्रयासों के कारण ही विद्यालय में चित्रकला, संगीत, पाककला तथा आत्मसुरक्षा के लिए भी प्रशिक्षण दिया जाने लगा है | रमती ने भी अपनी रूचि के अनुसार तैराकी एवं कराटे के प्रशिक्षण के लिए अपना नाम दे दिया | अब वह प्रतिदिन तालाब में तैरने का अभ्यास करती और सप्ताह में दो दिन कराटे की कक्षा में जाती | तैराकी में रमती काफी निपुण हो चुकी थी |
एक दिन रमती प्रतिदिन की भांति अभ्यास के लिए घर से निकली | वह तालाब के पास पहुँची ही थी कि उसका मन अपनी आगे की पढाई के बारे में सोचने लगा | वह मन ही मन योजना बना रही थी कि डॉ बनने के लिए बहुत पैसों की जरुरत होती है ,जो उसके माता-पिता के पास नहीं हैं | “काश उसे छात्रवृत्ति मिल जाए”| वह विचार कर ही रही थी कि अचानक उसे “छपाक “ पानी में किसी के कूदने की आवाज आई | उसने वहाँ से अपना ध्यान हटाया और पुनः अपनी योजना  पर ध्यान केन्द्रित करने लगी |
उसने फिर से “बचाओ-बचाओ” चिल्लाने की आवाज सुनी | रमती को लगा कि जरुर कोई गड़बड़ है | वह भागकर  हुए तालाब में कूद गई और डूबते बच्चे को किनारे निकाल कर ले आई| | अभी तक उसका मस्तिष्क केवल डूबने वाले को बचाने में लगा था | प्राथमिक उपचार के समय रमती ने देखा कि यह तो निखिल है अशोक चाचा का बेटा | जो अभी कक्षा दस में है | इसकी तो परीक्षा आने वाली हैं और यह इस हाल में! यह कदम निखिल ने क्यों उठाया ? रमती का दिमाग घूम रहा था | खैर वह निखिल को घर तक ले आई | तब तक निखिल के डूबने तथा रमती द्वारा उसे बचाने की बात पूरे गाँव में आग की तरह फैल चुकी थी |
अशोक चाचा-चाची निखिल के इस कदम से बदहवास से थे | वे हैरान थे कि निखिल ने यह कदम क्यों उठाया | उन्हें यह तो पता था कि निखिल की बोर्ड की परीक्षा आरम्भ होने वाली है और उसी ने बताया था कि उसकी तैयारी कोई ख़ास नहीं हो पा रही है | उन्होंने निखिल को कुछ न कहा न कुछ पूछा बल्कि रमती को निखिल की जान बचाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद दिया | उस दिन तो रमती ने भी निखिल से कोई बात नहीं की ,किन्तु उसने मन ही मन निश्चय किया कि वह इस विषय में निखिल से बात अवश्य करेगी | गाँव में चारों तरफ  रमती की बहादुरी की चर्चा हो रही थी | बड़े क्या ,बूढ़े क्या ,नौजवान, बच्चे  सभी की जुबान पर रमती की बहादुरी की चर्चा थी | वहीँ रमती के माता-पिता अपनी बेटी की प्रशंसा सुन-सुनकर गौरवान्वित हो रहे थे |
एक दिन मौका देखकर रमती ने निखिल से “उस घटना ” के बारे में बात की तो निखिल रो पड़ा | उसने रमती के सामने अपने मन की सारी बात रख दी | उसकी बातें सुनकर रमती हतप्रभ रह गई | निखिल भी डॉ बनना चाहता है किन्तु उसके माता-पिता भी आर्थिक रूप से कमजोर हैं | वह यह तो सोच रहा था कि मेडिकल की पढाई में पैसा बहुत लगेगा तो कहाँ से आएगा किन्तु यह नहीं सोचा उसने कि इसके लिए कक्षा दस की पढाई भी अत्यावश्यक है | जब दसवीं ही पास नहीं करेगा तो आगे की पढाई कैसे करेगा | रमती ने उसे समझाया ,कहा अभी भी बहुत समय है | तुम चाहो तो सब कुछ हो सकता है ,दृढ निश्चय के साथ संकल्प करो और अपने उददेश्य को पाने के लिए पूरे मन से जुट जाओ | सफलता तुम्हारे पीछे स्वयं आएगी | “जीवन समाप्त करना कायरों का काम है , कठिनाइयों में रास्ता खोजना ही बहादरी है |” रमती की बातें इतनी प्रभावशाली थीं कि निखिल के मन घर कर गई | एक नई चेतना ,नया आत्मविश्वास से भरा नजर आ रहा था निखिल | एक दृढ संकल्प के साथ उसने पढ़ाई आरम्भ की | रमती ने उसे आश्वासन दिया कि वह हर संभव उसकी सहायता करेगी | बस निखिल को अपने-आप पर भरोसा रखना है |
गाँवभर में रमती की बहादुरी की चर्चा तो थी ही , इस बार सरपंच जी ने छब्बीस जनवरी पर सम्मानित होने वाले बहादुर बच्चों के नाम में रमती का नाम भेज दिया | जब दिल्ली पत्र पँहुचा तो कुछ ही दिनों के बाद निरिक्षण के लिए एक टीम गाँव आ पहुँची | सारी खोजबीन के पश्चात टीम ने सब कुछ सही पाया तो रमती को बहादुरी का पुरस्कार मिलना निश्चित हो गया | दिसम्बर का महिना चल रहा था | बस अब कुछ दिनों की बात है ,हम सब टी वी पर रमती को देखेंगे | सबकी यही सोच थी ,नये वर्ष से ज्यादा रमती को टी वी पर देखना और राष्ट्रपति से पुरस्कार लेते हुए देखने की लालसा हर ग्रामवासी की थी | हो भी क्यों न रमती के कार्यों से सबका मस्तक जो ऊँचा हो रहा है |

आखिर वो दिन भी आ ही | सभी बहादुर बच्चों के साथ रमती को बहादुरी का पुरस्कार मिला | माता-पिता गर्व प्रसन्न हो रहे थे | गाँव लौटने पर रमती का स्वागत ढ़ोल-नगाड़े के साथ हुआ | पूरे गाँव में उत्सव का माहौल था | निखिल,चाचा-चाची सब उसके स्वागत में तत्पर थे | निखिल की जान बचाने के लिए मानो खुले ह्रदय से दुआ एवं धन्यवाद दे रहे थे | निखिल  रमती का आभार प्रकट कर रहा था | रमती पहले से ही सबकी प्रिय थी फिर आज की बात तो निराली ही थी | रमती ने भी सबका मान रखा और पुरस्कार की राशि गाँव के विकास के लिए दे दी |