काव्य –कथा
अनूठे मित्र
सचिन नाम का था एक बंदर ,
गलती से ,
घुस आया कालोनी के अंदर
वहाँ ,😀
हरा-भरा पार्क था सुंदर ,
ऊँचे-बड़े फलदार पेड़ देख,
लालच आया उसके अंदर ,
उसने ,
लोगों को बैठे जब देखा
कुछ सकुचाया , औ घबराया
छिप बैठा घने पेड़ के अंदर
हो चली थी सुबह से दोपहर
भूखा था ,
पर उसने किया नियंत्रण
दिया दिलासा अपने आप को
घर जायेंगे जब मानव सारे
चैन से खायेगा फल खूब सारे
यही सोच,
हो चली अब शाम
भूख ने उसको किया हताश
बार-बार सोचे यह बात ,
उसको जाने दो , तब तोडूंगा |
अरे ! अब ये आ गया !
इसको भी जाने दो तब खाऊंगा
पर,
आना-जाना थमा नहीं ,
बढ़ी भूख पर रुकी नहीं |
उफ़! यह क्या ?
बच्चों की टोली भी आई
धमा-चौकड़ी खूब मचाई
गेंद को सब-मिल खूब उछालें
इधर से मारें उधर से मारें
अ र र र र र र यह क्या !
सरपट आई सचिन के पास
खो बैठा वह होश-हवास
वापस उसने गेंद उछाली
बच्चों की टोली पर मारी
सब बच्चे थे खूब शरारती
पर,
बंदर देख टोली सकपकाई
रोहित सबसे नटखट बालक
पलक झपकते चढ़ा पेड़ पर
हाथ बढ़ाया तरफ सचिन के
पूछ रहा था दोस्त बनोगे ?
भूख से मारा , सचिन बेचारा
सोच रहा था छूट गया घर
माता-पिता भी छूट गए
न कोई मित्र न कोई बंधु
कैसा होगा इनका साथ ?
यही सोच भर आये आँसू
नटखट था रोहित ,
पर समझदार भी था बहुत
मन की पीड़ा भाँपी उसने
समझा दर्द बेजुबान वानर का
प्यार से थामा हाथ सचिन का
उतार पेड़ से दिया खाने को
बच्चा टोली हो गई उसकी
वो हो गया बच्चा टोली का
पर,
मन में तड़प थी ,था एकाकीपन
दूर भटक बिछड़ा अपनों से
सोच रहा था , ये सब बातें
अनायास आवाज थी आई
मानो माँ ने उसे पुकारा
भूल गया वो दर्द ही सारा
उछला-कूदा , दौड़ा-भागा
हो गया अपने झुण्ड में शामिल
माँ से चिपक गया था ऐसे
जैसे बिछड़ा था बरसों से
चूम रही थी माँ भी उसको
झूम रही थी बच्चा टोली
सचिन पास था माँ के अपनी |
ये निरीह प्राणी भी रहते हैं परिवार में
बिछड़ जाए यदि इनका कोई
बस शब्द नहीं होते हैं
पर,
ये भी हमारी तरह ही रोते हैं
समझो इन्हें भी अपने जैसा
जगत लगेगा मीठे सपने सा |
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