एक था राहुल
राहुल अपने परिवार का बड़ा ही लाडला बच्चा था ,किन्तु था बड़ा ही शरारती | दिमाग
बहुत ही तेज था किन्तु शरारतों के कारण हमेशा खुराफ़ात में ही लगा रहता था | कभी
अपनी कालोनी के बच्चों के पीछे गली के कुत्ते लगा देता तो कभी विद्यालय में नकली
छिपकली से शिक्षकों को डरा देता | हर दिन उसके दिमाग में नई-नई शरारतें जन्म लेतीं
थी | सबको खूब परेशान करता और दूसरों को परेशान देख बहुत खुश होता | उसकी इन
हरकतों से सब परेशान थे | आए दिन उसके मम्मी-पापा को विद्यालय बुलाकर उसकी शिकायत
की जाती, तो कभी कॉलोनी के बड़े-बुजुर्ग उसके पिताजी को ढ़ेरों नसीहतें दे डालते पर उस
पर कोई असर नहीं होता | माँ का तो जैसे घर से निकलना ही दूभर हो चला था |
राहुल भी अब छोटा न रहा ,
वह भी किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख रहा था | पर उसकी शरारतों में कोई कमी न आई | एक दिन उसके
खुराफाती दिमाग में कुछ गलत करने की कुलबुलाहट हो रही थी , तभी उसको एक नेत्रहीन
बुजुर्ग दिखाई दिए | बुजुर्गों से उसे वैसे ही कुछ नफरत सी थी , क्योंकि वे उसकी
शिकायत उसके पिता से जो करते थे | खैर आज उसने कुछ अलग करने का सोचा और उसने नेत्रहीन
बुजुर्ग को रास्ता पार कराने के बहाने सड़क के बीच बैठे आवारा पशुओं के पास छोड़ने
का निर्णय लिया | अगले ही क्षण उसने बड़े ही विनम्र भाव से बाबाजी से आग्रह किया कि
क्या वह उनकी कोई सहायता कर सकता है ? बुजुर्ग की सहमति मिलते ही उसने सड़क पार
कराने के बहाने आवारा पशुओं के पास ले जाकर छोड़ दिया और बोला “ बाबाजी अब आप सीधे
जा सकते हैं “ बाबाजी ने उसे खूब आशीर्वाद दिया |
विवेक बहुत ही सद्विचारों वाला सहृदय एवं विनम्र बालक था | वह अपनी साईकल से
घर जा रहा था , जैसे ही उसकी नज़र नेत्रहीन बाबाजी पर पड़ी वह तुरंत ही साईकल से
लगभग कूद ही पड़ा और उनका हाथ पकड़कर दूसरी ओर ले गया | अचानक इस तरह होने से बाबाजी
कुछ परेशान हो गए , उन्होंने विवेक से पूछा , तो विवेक ने सारी बात बता दी कि वे आवारा पशुओं के झुण्ड के समीप पहुँच रहे थे |
बाबाजी ने कहा- “बेटा मेरी ही गलती है , मुझे तो तुम्हारे जैसे ही बालक ने मुझे
रास्ता पार करवाया और यहाँ छोड़ा था “ खैर विवेक ने ज्यादा न सोचकर बाबाजी को उनके
गंतव्य तक छोड़ दिया जहाँ उनके साथी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे | इसी बीच राहुल ने
सोचा कि अब ज़रा देखा तो जाए कि बाबाजी का क्या हुआ ? वह यह सब सोच रहा था और बड़ा
खुश था कि “अहा ,बड़ा मज़ा आएगा “ वह इसी में खोया हुआ था उसका ध्यान सड़क पर था ही
नहीं कि एक सांड बड़ी तेजी से उसकी ओर बढ़ रहा था | विवेक भी बड़ी जल्दी में था
किन्तु जैसे ही उसने सांड को राहुल की तरफ आते देखा तो उसने राहुल को दूसरी ओर धक्का
दे दिया , राहुल कुछ समझ पाता कि सांड तेजी से उसके पास से निकल गया , राहुल
बाल-बाल बच गया था | विवेक ने साईकल एक ओर खड़ी कर राहुल को सहारा देकर उठाया और पुछा कि-“
भाई ध्यान कहाँ था तुम्हारा , अभी तुम्हें कुछ हो जाता तो तुम्हारे माता-पिता
कितने परेशान हो जाते “ | राहुल ने उसे धन्यवाद दिया | राहुल ने सड़क पार निगाह
डाली तो विवेक ने पूछा कि “किसे ढूंढ़ रहे हो “ राहुल ने विवेक को बुजुर्ग के बारे
में बताया तो विवेक ने कहा-“ तुम उनकी चिंता मत करो वे सुरक्षित हैं मैंने उन्हें
उनके मित्रों तक पहुँचा दिया है, चलो तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देता हूँ |” यह कहकर
विवेक ने राहुल को अपनी साईकल पर बिठा लिया | विवेक ने राहुल को कहा कि वह पहले
अपने माता-पिता को बताएगा कि वह कहाँ एवं क्यों जा रहा है अन्यथा वे व्यर्थ ही
चिंता करेंगे | जैसे ही विवेक ने अपनी कॉलोनी में प्रवेश किया छोटे बच्चे विवेक
भैया विवेक भैया कहकर उसे बुला रहे थे वह
भी सबसे हँसकर बोल रहा था | रास्ते में उसे जो भी बड़े-बुजुर्ग मिलते वह उन्हें
प्रणाम कर रहा था वे भी उसे आशीर्वाद दे रहे थे | रास्ते में राहुल सोच रहा था कि
विवेक उसकी ही उम्र का है किन्तु उसमें और विवेक में कितना फर्क है | विवेक जैसे
ही घर पहुँचा द्वार पर ही उसके पिताजी मिल गए , विवेक ने संक्षेप में उन्हें सारी
घटना बता दी और कहा कि वह राहुल को उसके घर छोड़कर जल्दी ही वापस आ जायेगा |
जब विवेक अपने पिता को सारी बातें बता रहा था तो विवेक के पिता के चेहरे पर
गर्व के भावों को राहुल ने बखूबी देखा और उसे बड़ा ही बुरा लगा कि –“ एक मैं हूँ
जिसके माता-पिता को मेरी वजह से आए दिन शर्मिंदा होना पड़ता है “| उसका मन
आत्मग्लानि से भर उठा | उसने निर्णय लिया कि वह भी विवेक की भांति बनेगा | उसके
माता-पिता भी उस पर गर्व कर सकेंगे | विवेक की कुछ ही देर की संगति ने राहुल का
ह्रदय परिवर्तन कर दिया |
सच ही कहा है रहीम दास जी ने कि -
कदली सीप भुजंग मुख स्वांति एक गुन तीन
जैसी संगति बैठिये तैसो ही फल दीन्ह |
एक प्रेरक कहानी जो सभी बच्चो को सुनानी चाहिए।
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