Tuesday, 5 June 2018


                        बनो सह्रदय

                        
आदित्य अपने घर का सबसे छोटा और बहुत लाडला बच्चा है | घर के सभी सदस्य उसे खूब प्यार करते हैं , इस कारण वह शरारती भी है | इधर कुछ दिनों से दादाजी की पैनी और पारखी नजरों ने आदित्य में बहुत बड़ा परिवर्तन देखा, जो  उन्हें नकारत्मक लगा | गलती आदित्य की भी नहीं कही जा सकती क्योंकि वह एक बड़े संयुक्त परिवार का सबसे छोटा सदस्य है | जहाँ अनुशासन है, रिश्तों की मर्यादा एवं गरिमा है तो युवा पीढ़ी की स्वछन्दता एवं हठीलापन भी है | तो बात करते हैं आदित्य की | आदित्य के ताऊ जी का बेटा नरेश जब ९८% अंक से कक्षा बारहवीं में पास हुआ तो घर में बहुत ख़ुशी का माहौल था | दादाजी तो फूले नहीं समा रहे थे | प्रसन्नतावश उन्होंने एक शानदार भोज के आयोजन की घोषणा कर दी | सभी मित्रों ,स्नेहीजनों को आमंत्रित किया गया |
पड़ोस में गुप्ता अंकल के परिवार को भी बुलाया गया | हालांकि उस परिवार ने कभी भी आदित्य के परिवार से सम्बन्ध ठीक नहीं रखे | उन्हें हर वक्त आदित्य के परिवार को देखकर ईर्ष्या ही होती थी | इस कारण उनके परिवार में कोई कमी न होने के बावजूद एक जो कमी थी वो थी प्यार एवं सौहार्द की | यह जानते हुए भी कि गुप्ताजी का परिवार हमें पसंद नहीं करता है दादाजी नित्यप्रति उनके मुखिया से राम-राम करते, सबकी कुशल क्षेम पूछते | नरेश और गुप्ता जी के बेटे की बिलकुल भी नहीं बनती थी जबकि दोनों ही एक ही विद्यालय में पढ़ते हैं और पढ़ाई में भी एक समान हैं | कुछ दिनों पहले दोनों बच्चों में बड़ा झगड़ा हुआ था | समाप्त भी हो गया किन्तु नन्हें आदित्य के कोमल मन पर बुरी छाप छोड़ गया | वह घर में सबसे छोटी-छोटी बात पर नाराज हो जाता , लड़ाई करने लगता | उसे सबमें बुराई ही दिखाई देने लगी | जब दादाजी ने उससे कहा कि आदि चलो गुप्ताजी को भी डिनर के लिए बुलाते हैं तो वह एकदम से बिफर उठा और गुस्से से बोला उन्हें कोई नहीं बुलाएगा , हमें उनसे कोई बात नहीं करनी | दादाजी ने पूछा कि क्यों भई ऐसा क्या हो गया ? आदित्य ने कहा कि नरेश भैया कह रहे थे कि वे लोग बहुत बुरे हैं , हमारे लिए हमेशा बुरा ही सोचते हैं ,फिर हम क्यों उन्हें अपने घर बुलाएँ ? दादाजी ने कहा चलो मानते हैं कि वे हमारे बारे में बुरा सोचते हैं किन्तु हम तो उनके बारे में अच्छा सोचें देखना ऐसा करने पर वे एक दिन जरूर बदल जाएँगे | आदित्य को कुछ समझ नहीं आया | वह कुछ समझना नहीं चाहता था | उसके दिमाग में तो बस नरेश भैया की बातें ही छाई हुई थीं | दादाजी उसके मन को ताड़ गए , उन्होंने भी उस समय व्यर्थ ही गाल बजाना उचित नहीं समझा और रात की प्रतीक्षा करने लगे | हर दिन की भाँती रात को आदित्य दादाजी से कहानी सुनने के लिए आया तो दादाजी ने कहा आदित्य आज मैं तुम्हें जो कहानी सुनाऊँगा उसे ध्यान से तो सुनना ही साथ ही जो पूछूँगा उसका उत्तर भी तुम्हें देना ही होगा | आदित्य का जवाब हाँ में था | दादाजी ने कहानी शुरू की |
बहुत पुरानी बात है | एक राजा था | उसके राज्य में एक साधु आया उसने अपनी ज्योतिष विद्या से राजा के जीवन के बारे में घोषणा की कि आज से दो दिन पश्चात उत्तर दिशा में स्थित पीपल के वृक्ष के नीचे बांबी में रहने वाले एक सर्प के काटने से राजा की मृत्यु हो जाएगी | दरबार में जिसने भी सुना उस साधु से अत्यंत नाराज हुआ किसी ने कहा कि “ महाराज इसे बंदी बना लिया जाए” , तो किसी ने कहा कि इसे फांसी दी जाए | जितने मुँह उतनी बातें | राजा शांत , सबकी बातें सुन रहा था | उसने सेवकों को आदेश दिया कि पीपल के पेड़ से लेकर राजमहल तक के मार्ग को फूलों से सजाओ, सारे रास्ते में इत्र का छिड़काव करो एवं थोड़ी-थोड़ी दूरी पर चांदी के कटोरे में दूध भरकर रखो | राजा का यह आदेश सुनकर प्रजा अचंभित थी किन्तु क्या किया जा सकता था राजा का आदेश था तो पालन तो होना ही था | दादीजी ने दादाजी को टोका कि “क्या आप भी रात में बच्चे को सर्प की कहानी सुना रहे हैं” | दादाजी ने  दादी से कहा “तुम बेकार की चिंता करती हो, हमारा आदित्य कोई  डरपोक थोड़ी न है बड़ा ही बहादुर है ये” | यह कहकर उन्होंने आदित्य की पीठ थपथपाई | दादाजी आगे भी तो बताइए कि क्या राजा सचमुच मर गया ? दादाजी ने कहा अरे राजा इतनी जल्दी मरता है क्या ? और ठहाका लगाकर हँसने लगे | खैर दादाजी ने कहानी आगे बढ़ाई कि निश्चित समय पर सर्प बांबी से बाहर आया और महल की ओर बढ़ने लगा | सारे रास्ते उसने फूलों की सुगंध का आनंद उठाया और दूध भी पिया | जब वह महल पहुँच तो उसका मन बदल चुका था | उसने सोचा कि जब राजा को पता है कि “मैं उसे मारने के लिए जा रहा हूँ फिर भी उसने मेरे रास्ते को इस प्रकार सजवाया है, मेरे लिए भोजन का प्रबंध भी किया है | सचमुच राजा एक महान आत्मा है”| उसने राजा के समीप जाकर कहा “ हे राजन मैं तुम्हारी इस सहृदयता से प्रसन्न हूँ तुम जो चाहो मुझसे माँग सकते हो”| राजा ने हाथ जोड़कर कहा “ हे सर्प देव ईश्वर का दिया सब कुछ है मेरे पास किन्तु यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो कृपया बताइए कि आप मेरे प्राण क्यों लेना चाहते हैं”| सर्प ने कहा – राजन ये पूर्व जन्म की बात है हम दोनों में बड़े ही गहरी मित्रता थी | हम दोनों भ्रमण पर थे कि अचानक पैर फिसलने से मैं कुएँ में गिर गया और मेरी मृत्यु हो गई | तुमने मुझे बचाने का पूरा प्रयास किया किन्तु असफल रहे | मैंने इस घटना का जिम्मेदार तुम्हें समझा और सर्प के रूप में जन्म लेने के बाद भी तुमसे बदला लेने की सोचता रहा | तुम तो पूर्व जन्म की सब बातों को भूल गए किन्तु मुझे सब याद रहा | आज मृत्यु को समीप जानकर भी तुमने मेरा जो स्वागत किया है उससे मुझे प्रायश्चित है कि मैं पिछले जन्म में  गलत था जो इतने वर्षों तक बदले की आग में जलता रहा”| उसने प्रसन्न होकर राजा को अपनी मणि दे दी और अपने प्राण त्याग दिए |
दादाजी ने देखा कि आदि ने बड़े ही ध्यान से कहानी सुनी है | उन्होंने पूछा “कहो आदि कैसी लगी कहानी |” आदि बोला –“दादाजी एकदम मस्त , अब आप पूछोगे कि क्या सीख मिली इस कहानी से तो मेरा उत्तर तैयार है कि अपने अच्छे कामों  (सद्कर्मो ) से अपने शत्रुओं को भी अपना मित्र बना सकते हैं ” “मेरा उत्तर सही है न दादाजी” | आदित्य की बात सुनकर दादा-पोता और दादी खिलखिलाकर हँस पड़े | अगली सुबह आदित्य का एक नया रूप देखकर सब अचंभित थे |      
      

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