Thursday, 18 January 2018


       तरुवर हमारे , सच्चे सहचर

रोहन की दादी का पूरी सोसाइटी में बड़ा सम्मान था | बच्चे क्या,बूढ़े क्या हर कोई उनकी बात को मानते थे | पर बाल-मन तो बाल मन ठहरा उन्मुक्तता , मासूमियत तथा कुछ भी कर गुजरने की फितरत इन बच्चों में भरी पड़ी थी | इसलिए थोड़े निरंकुश भी थे | जब चाहे पार्क में खेलते यूँ ही घुमते समय पेड़-पौधों को नुक्सान पहुँचाते रहते थे | वे प्रायः देखा करती थीं कि बच्चे पार्क में खेलते समय अक्सर पेड़ों की डालियाँ , पत्ते एवं फूलों को बेरहमी से तोड़ डालते थे | बहुत विचार करने के बाद दादी ने उन्हें सुधरने की युक्ति निकाली और उन्हें वास्तविकता पर आधारित कहानी सुनानी आरम्भ की |
 मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक पक्का साथ निभाते हैं ये वृक्ष, निशब्द रहकर अपना कर्तव्य निभाते रहते हैं | जीवित रहने के लिए प्रत्येक प्राणधारी को अनवरत प्राणवायु प्रदान करते हैं | तो चलो बच्चों आज इन वृक्षों की परोपकारी प्रवृत्ति की कहानी बताती हूँ | रोहन की दादी ने रोहन और उसके दोस्तों को बताया तो छोटे-छोटे बच्चे आश्चर्य से दादी का मुँह ताकने लगे | उन्हें तो कभी किसी ने बताया ही नहीं था कि वृक्षों की हमारे जीवन में कितनी महत्ता है | सभी की आँखें बड़ी उत्सुकता से दादी की ओर देख रही थी और वे सब दादी की बात शुरू होने की प्रतीक्षा कर रहे थे | दादी ने अपनी बात संत कबीर के इस दोहे से आरम्भ की
तरुवर फल नहीं खात हैं , सरवर पियत न नीर |
परमारथ  के कारने संतन , धरा सरीर ||
समझे बच्चों ! दादी ने पूछा तो आदित्य ने कहा दादी थोड़ा-थोड़ा समझ आया पूरा नहीं | दादी ने कहा मैं बताती हूँ कि पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते , नदियाँ जल स्वयं नहीं पीतीं ,परोपकार करने के लिए ही अच्छे मनुष्य जन्म लेते हैं | हमारी प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया है बस जरूरत है तो उसे सहेजने की , संभालकर रखने की | प्रकृति का एक बहुत ही ख़ास हिस्सा हैं तरुवर | आज विश्व में बाढ़ आदि की जो समस्या होती है न उसे रोकने में ये बहुत सहायक होते हैं क्योंकि ये मिटटी के कटाव को रोकते हैं ,जहाँ वृक्षों के घने जंगल होते हैं वहाँ मवेशियों (जानवरों) के लिए चारा (भोजन )मिलता है | वृक्ष अप्रत्याशित रूप से हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं क्योंकि ये स्वयं को कीटों से बचाने के लिए फाइनटोनसाइड रसायन हवा में छोड़ते हैं , इसमें एंटी बैक्टीरियल खूबी होती है | साँसों के जरिये जब ये हमारे शरीर में जाता है तो हमारी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है | दादी ने कहा यह तो तुम लोग भी जानते हो न कि वृक्ष प्रदूषण को कम करते हैंसब बच्चे एक साथ बोल उठे हाँ-हाँ दादी ये वातावरण से कार्बनडाईऑक्साईड सोख कर उसे ऑक्सीजन में बदल देते हैं, और हमें शुद्ध प्राणवायु देते हैं”| दादी ने सबको शाबाशी दी और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोलीं पता है बच्चों यदि किसी के घर के आस-पास घने पेड़ लगे हों तो गर्मियों में उस घर में बिजली का बिल कम आता है | “ऐ ! निशि ने कहा ऐसा कैसे हो सकता है दादी , बिजली के बिल का पेड़ों से क्या मतलब” | दादी ने कहा है मतलब , वो ऐसे कि घर के आस-पास पेड़-पौधे लगाने से बगीचे से वाष्पीकरण बहुत कम होता है| “ये वाष्पीकरण क्या होता है दादीनलिन ने पूछा | दादी कुछ कहती उनसे पहले मिनी बोल उठी इवेपोरेशन होता है ये | इससे हमारी धरा तक सूर्य की किरणें सीधी नहीं पहुँच पाती और  पानी को भाप बना कर नहीं उड़ा पातींक्यों दादी ऍम आई राईट”| दादी ने कहा मिनी यू आर अब्सोल्युटली राईट”| इसके अलावा तरु सूर्य की हानिकारक किरणों से भी हमारा बचाव करते हैं | सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें हमारी त्वचा को बहुत हानि पहुँचाती हैं, ये किरणें त्वचा के कैंसर के लिए जिम्मेदार होती हैं | स्कूलों तथा पार्कों में घने वृक्ष होने से बच्चे इन हानिकारक किरणों से बचे रहते हैं | वृक्षों की पत्तियाँ,टहनियाँ और शाखाएँ तेज शोर को रोकती हैं तथा तेज बारिश की गति को धीमा कर धरती की मिटटी को कटने से बचाती हैं | पेड़ों की पत्तियाँ , तने और जड़ें पक्षियों ,जानवरों तथा कीट-पतंगों को रहने के लिए घर देते हैं | विकास के चक्कर में हम पेड़ों को काटते तो जा रहे हैं पर लगाते नहीं हैं और लगाते भी हैं तो उनकी देखभाल सही तरीके से नहीं करते जिससे वे मर जाते हैं |
अब बात यह है कि जब ऐसे तरुवर जो कि वास्तविक अर्थों में हमारे सच्चे मित्र हैं , ये अपनी मित्रता निभाते हैं तो क्या हमारा कर्तव्य नहीं है कि हम इन्हें बचाएँ और नये पेड़ लगाकर धरती को हरा-भरा बनाएँ |
सभी बच्चे दादी की इन बातों को बड़े ही ध्यान से सुन रहे थे | वे सचमुच बहुत प्रभावित थे इन बातों से | वे आपस में कहने लगे कि यार दादी की बातों में दम तो है तो क्यों न हम पेड़ों को बचाने का कार्य करें और नये भी लगाएँ | सबने एक साथ पेड़ों को बचाने एवं नये लगाने की शपथ ली | दादी के चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान फ़ैल रही थी क्योंकि उन्होंने आज अपने लक्ष्य की पहली सीढ़ी पार कर ली थी | उन्होंने इन मासूमों को राह पर लाने के लिए यह राह चुनी थी |  उन्हें अपनी  मंजिल स्पष्ट दिखाई दे रही थी |     


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