Thursday, 29 June 2017

एक था राहुल

राहुल अपने परिवार का बड़ा ही लाडला बच्चा था ,किन्तु था बड़ा ही शरारती | दिमाग बहुत ही तेज था किन्तु शरारतों के कारण हमेशा खुराफ़ात में ही लगा रहता था | कभी अपनी कालोनी के बच्चों के पीछे गली के कुत्ते लगा देता तो कभी विद्यालय में नकली छिपकली से शिक्षकों को डरा देता | हर दिन उसके दिमाग में नई-नई शरारतें जन्म लेतीं थी | सबको खूब परेशान करता और दूसरों को परेशान देख बहुत खुश होता | उसकी इन हरकतों से सब परेशान थे | आए दिन उसके मम्मी-पापा को विद्यालय बुलाकर उसकी शिकायत की जाती, तो कभी कॉलोनी के बड़े-बुजुर्ग उसके पिताजी को ढ़ेरों नसीहतें दे डालते पर उस पर कोई असर नहीं होता | माँ का तो जैसे घर से निकलना ही दूभर हो चला था |
           राहुल भी अब छोटा न रहा , वह भी किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख रहा था | पर उसकी शरारतों में कोई कमी न आई | एक दिन उसके खुराफाती दिमाग में कुछ गलत करने की कुलबुलाहट हो रही थी , तभी उसको एक नेत्रहीन बुजुर्ग दिखाई दिए | बुजुर्गों से उसे वैसे ही कुछ नफरत सी थी , क्योंकि वे उसकी शिकायत उसके पिता से जो करते थे | खैर आज उसने कुछ अलग करने का सोचा और उसने नेत्रहीन बुजुर्ग को रास्ता पार कराने के बहाने सड़क के बीच बैठे आवारा पशुओं के पास छोड़ने का निर्णय लिया | अगले ही क्षण उसने बड़े ही विनम्र भाव से बाबाजी से आग्रह किया कि क्या वह उनकी कोई सहायता कर सकता है ? बुजुर्ग की सहमति मिलते ही उसने सड़क पार कराने के बहाने आवारा पशुओं के पास ले जाकर छोड़ दिया और बोला “ बाबाजी अब आप सीधे जा सकते हैं “ बाबाजी ने उसे खूब आशीर्वाद दिया |
विवेक बहुत ही सद्विचारों वाला सहृदय एवं विनम्र बालक था | वह अपनी साईकल से घर जा रहा था , जैसे ही उसकी नज़र नेत्रहीन बाबाजी पर पड़ी वह तुरंत ही साईकल से लगभग कूद ही पड़ा और उनका हाथ पकड़कर दूसरी ओर ले गया | अचानक इस तरह होने से बाबाजी कुछ परेशान हो गए , उन्होंने विवेक से पूछा , तो विवेक ने सारी बात बता दी कि वे आवारा पशुओं के झुण्ड के समीप पहुँच रहे थे | बाबाजी ने कहा- “बेटा मेरी ही गलती है , मुझे तो तुम्हारे जैसे ही बालक ने मुझे रास्ता पार करवाया और यहाँ छोड़ा था “ खैर विवेक ने ज्यादा न सोचकर बाबाजी को उनके गंतव्य तक छोड़ दिया जहाँ उनके साथी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे | इसी बीच राहुल ने सोचा कि अब ज़रा देखा तो जाए कि बाबाजी का क्या हुआ ? वह यह सब सोच रहा था और बड़ा खुश था कि “अहा ,बड़ा मज़ा आएगा “ वह इसी में खोया हुआ था उसका ध्यान सड़क पर था ही नहीं कि एक सांड बड़ी तेजी से उसकी ओर बढ़ रहा था | विवेक भी बड़ी जल्दी में था किन्तु जैसे ही उसने सांड को राहुल की तरफ आते देखा तो उसने राहुल को दूसरी ओर धक्का दे दिया , राहुल कुछ समझ पाता कि सांड तेजी से उसके पास से निकल गया , राहुल बाल-बाल बच गया था | विवेक ने साईकल एक ओर  खड़ी कर राहुल को सहारा देकर उठाया और पुछा कि-“ भाई ध्यान कहाँ था तुम्हारा , अभी तुम्हें कुछ हो जाता तो तुम्हारे माता-पिता कितने परेशान हो जाते “ | राहुल ने उसे धन्यवाद दिया | राहुल ने सड़क पार निगाह डाली तो विवेक ने पूछा कि “किसे ढूंढ़ रहे हो “ राहुल ने विवेक को बुजुर्ग के बारे में बताया तो विवेक ने कहा-“ तुम उनकी चिंता मत करो वे सुरक्षित हैं मैंने उन्हें उनके मित्रों तक पहुँचा दिया है, चलो तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देता हूँ |” यह कहकर विवेक ने राहुल को अपनी साईकल पर बिठा लिया | विवेक ने राहुल को कहा कि वह पहले अपने माता-पिता को बताएगा कि वह कहाँ एवं क्यों जा रहा है अन्यथा वे व्यर्थ ही चिंता करेंगे | जैसे ही विवेक ने अपनी कॉलोनी में प्रवेश किया छोटे बच्चे विवेक भैया विवेक भैया  कहकर उसे बुला रहे थे वह भी सबसे हँसकर बोल रहा था | रास्ते में उसे जो भी बड़े-बुजुर्ग मिलते वह उन्हें प्रणाम कर रहा था वे भी उसे आशीर्वाद दे रहे थे | रास्ते में राहुल सोच रहा था कि विवेक उसकी ही उम्र का है किन्तु उसमें और विवेक में कितना फर्क है | विवेक जैसे ही घर पहुँचा द्वार पर ही उसके पिताजी मिल गए , विवेक ने संक्षेप में उन्हें सारी घटना बता दी और कहा कि वह राहुल को उसके घर छोड़कर जल्दी ही वापस आ जायेगा |
जब विवेक अपने पिता को सारी बातें बता रहा था तो विवेक के पिता के चेहरे पर गर्व के भावों को राहुल ने बखूबी देखा और उसे बड़ा ही बुरा लगा कि –“ एक मैं हूँ जिसके माता-पिता को मेरी वजह से आए दिन शर्मिंदा होना पड़ता है “| उसका मन आत्मग्लानि से भर उठा | उसने निर्णय लिया कि वह भी विवेक की भांति बनेगा | उसके माता-पिता भी उस पर गर्व कर सकेंगे | विवेक की कुछ ही देर की संगति ने राहुल का ह्रदय परिवर्तन कर दिया |

 सच ही कहा है रहीम दास जी ने कि -
कदली सीप भुजंग मुख स्वांति एक गुन तीन 
जैसी संगति बैठिये तैसो ही फल दीन्ह |

Saturday, 4 March 2017

                           एक प्रयास ऐसा भी (कहानी)
पड़ोस में रहने वाली प्रज्ञा के घर से रोज ही बच्चे  के रोने की , बुजुर्गों को मिलने वाली नसीहतों की और घर में काम  करने वाली क्षमा दीदी को दिनभर क्या-क्या करना है , बेटे को क्या खिलाना है, कब नहलाना है ,कब सुलाना है, माँ–बाबूजी को क्या खाना देना है,कब कौन सी दवाई देनी है आदि आदि निर्देशों की आवाजें रोज सुबह-सुबह आतीं हैं | प्रज्ञा मल्टी नॅशनल कम्पनी में उच्च पद पर है ,उसका पति प्रवीन भी सरकारी नौकरी में है | दोनों पति पत्नी अच्छा  पैसा कमाते  हैं | दोनों की कमाई तो अच्छी हो रही है ,पैसे की कमी नहीं है बस यदि कमी है तो रिश्तों में आत्मीयता की |
रानी रोज-रोज यह सब देखती –सुनती तो उसका मन बड़ा ही विचलित हो जाता | एक दिन उसके मन की उथल-पुथल कुछ अधिक ही बढ़ गई | वह बड़ी ही गंभीरता से विचार करने लगी | अचानक उसके कानों में टी वी पर आते डायपर के विज्ञापन की आवाज पड़ी ,उसका तो मानो मन ही खिल उठा, जैसे उसे समाधान के पिटारे की चाबी मिल गई | वह इन डायपरस के इर्द-गिर्द समस्या का समाधान ढूंढने लगी | रानी सोच रही थी कि प्रज्ञा बेटे को दिन-रात डायपर पहनाकर रखती है | उसके जाने के बाद क्षमा कितनी बार चेक करती है कि बेटा कहीं गंदगी में तो नहीं है | यह प्रज्ञा को बिलकुल नहीं पता | क्षमा भी क्या करे ,सारे घर की और घर के हर सदस्य की जिम्मेवारी उसी की है | आखिर वह भी तो इंसान है ,उसका भी तो घर-परिवार है |
डेढ़ साल का बेटा है प्रज्ञा का | इन डायपरस में ये मासूम कितना झेलता है अपनी ही गंदगी को | रानी का दिमाग भन्ना रहा था | स्वर्ग-नरक की बातें उसे भ्रमित कर उसके दिमाग पर लगातार चोट कर रही थीं कि कितनी कठिनाइयों को झेलकर माँ एक बच्चे को जन्म देती है | माँ के उदर में शिशु भी तो कितने कष्ट में रहता है , उल्टा लटका रहता है और सभी तरह के कष्ट झेलने के पश्चात नौ माह बाद संसार में जन्म लेता है | और फिर सिलसिला शुरू हो जाता है इन डायपरस के साथ जीने का | कामकाजी महिलाएँ इतनी अभ्यस्त हैं इन डायपरस के प्रयोग  की कि दिन हो या रात बेचारे शिशु को इनसे छुटकारा नहीं मिलता | वह कहे भी तो कैसे उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता अभी विकसित नहीं हुई है | एक गंदगी से निकलकर बेचारा दूसरे दल-दल में जा फंसा है | न जाने ऐसे कितने ही प्रश्न रानी को व्यथित कर रहे थे | वह सोचने लगी हमारा ही समय ही अच्छा था कि हम अपने बच्चों को कपड़े से बनी मुलायम नैपी पहनाते थे और गीली होने पर तुरंत बदल देते थे | नैपी बदलना एक काम अवश्य था किन्तु इस बहाने माँ का स्पर्श कितनी सुखद अनुभूति देता था शिशु को | दोनों का रिश्ता दिनोंदिन मजबूत होता जाता था | दोनों के बीच निरंतर एक मूक संवाद तथा प्यार का आदान-प्रदान होता था | शिशु पूरी तरह से माँ पर आश्रित होता है किन्तु जब तक माँ का समर्पण नहीं होगा यह रिश्ता खोखला ही रहेगा | बार-बार माँ का स्पर्श ,उसकी आवाज , उसकी आहट ,सबका पता होता है शिशु को | माँ के स्पर्श के साथ ही माँ-बच्चे में एक गहरा नाता जुड़ जाता है | अपने हाथों से नहलाना ,कपड़े पहनाना ,खाना खिलाना ,लोरी सुनाकर सुलाना ,बार-बार प्यार से चूमना ,जरा सा रोने पर गोद में उठा कर सर पर प्यार से हाथ फेरना | ऐसी ही न जाने कितनी ही बातें माँ-बच्चे के बीच अटूट रिश्ता बना देती थीं | एक दूसरे  को बिलकुल नजदीक ला देती थीं | इतनी कि दोनों को एक दूसरे बिना अधूरा बना देती थी | और आज का जमाना रानी सोच रही थी  बाप रे! क्या है | सिर्फ मशीन बनकर रह गई  है माँ , पैसे कमाने की मशीन | अपनी ममता लुटाने के बजाय आया की गोद दे दी | आया को अपनी तनख्वाह से मतलब है न कि बच्चे की सही देखभाल से | माँ की अनुपस्थिति में जब बच्चा रोता है तो उसे डांट-डपटकर जबदस्ती चुप कराती है | उसके पास माँ के जैसी कोमल भावनाओं का ममता भरा स्पर्श नहीं होता ,जो बच्चे को भावनात्मक रूप से सपोर्ट कर मानसिक शांति दे सके | उसे अहसास करा  पाए कि बेटा चुप हो जा तेरी माँ तेरे साथ है | गंद से भरे डायपर में बच्चे की छटपटाहट का पता ही नहीं चलता कि वो कहने की कोशिश में है कि इस गंदगी से मुझे मुक्त करो | ऐसे कितने ही किस्से हैं भावनाओं से जुड़े | आज समाज में क्या दे रहीं हैं माएँ अपने बच्चों को | हाँ एक बात सौ प्रतिशत सही है कि आप जो देते हैं वही बढ़कर आपको वापस मिलता है | कहते हैं न कि “बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से पायें |”  सही बात है आज हम जो अपने बच्चों को डायपर पहना रहे हैं तो कोई बड़ी बात नहीं होगी यदि भविष्य में वो हमें पहनाएँ | क्योंकि बचपन और बुढ़ापा एक-दूसरे के पर्याय हैं | हे भगवान ! यह सब सोच-सोचकर रानी की बैचैनी बढती ही जा रही है | इस युग में हमने पाश्चात्य संस्कृति को अपनाकर जो भूल की है वह आज हमारे सामने एकाकी परिवार और वृद्धाश्रम के रूप में है | हम चाहते तो हैं बहुत कुछ करना पर होता कुछ और ही है | कुछ भी सहज नहीं है ,सब कुछ बनावटी है | आज हमारे पास बच्चों के लिए समय नहीं है कल उनके पास हमारे लिए नहीं होगा तब कोसने का क्या लाभ होगा | बस आज सुधारो ,कल अपने आप सुधर जाएगा |

मन में उठते इन बवंडरों के साथ रानी बड़े ही पशोपेश में थी | अचानक वह उठ खड़ी हुई एक नए संकल्प के साथ कि वह महिला मंडल के साथ इस विषय पर चर्चा करेगी और बच्चों और बुजुर्गों के प्रति प्रेम और सौहार्द की अलख जगाएगी | नई पीढ़ी को सुधारने हेतु उसकी महिला मंडली कदम उठाएगी , बिखरते-टूटते परिवारों तथा रिश्तों को सहेजने का प्रयास करेगी | भले ही यह कदम छोटा होगा ,किन्तु इसके परिणाम दूरगामी तथा सुखद ही होंगे |

  


Saturday, 18 February 2017

                        काव्य –कथा 
                      अनूठे मित्र 
सचिन नाम का था एक बंदर ,
गलती से ,
घुस आया कालोनी के अंदर
वहाँ ,😀
हरा-भरा पार्क था सुंदर ,
ऊँचे-बड़े फलदार पेड़ देख,
लालच आया उसके अंदर ,
उसने ,
लोगों को बैठे जब देखा
कुछ सकुचाया , औ घबराया
छिप बैठा घने पेड़ के अंदर
हो चली थी सुबह से दोपहर
भूखा था ,
पर उसने किया नियंत्रण
दिया दिलासा अपने आप को
घर जायेंगे जब मानव सारे
चैन से खायेगा फल खूब सारे
यही सोच,
हो चली अब शाम
भूख ने उसको किया हताश
बार-बार सोचे यह बात ,
उसको जाने दो , तब तोडूंगा |
अरे ! अब ये आ गया !
इसको भी जाने दो तब खाऊंगा
पर,
आना-जाना थमा नहीं ,
बढ़ी भूख पर रुकी नहीं |
उफ़! यह क्या ?
बच्चों की टोली भी आई
धमा-चौकड़ी खूब मचाई
गेंद को सब-मिल खूब उछालें
इधर से मारें उधर से मारें
अ र र र र र र यह क्या !
सरपट आई सचिन के पास
खो बैठा वह होश-हवास
वापस उसने गेंद उछाली
बच्चों की टोली पर मारी
सब बच्चे थे खूब शरारती
पर,
बंदर देख टोली सकपकाई
रोहित सबसे नटखट बालक
पलक झपकते चढ़ा पेड़ पर
हाथ बढ़ाया तरफ सचिन के
पूछ रहा था दोस्त बनोगे ?
भूख से मारा , सचिन बेचारा
सोच रहा था छूट गया घर
माता-पिता भी छूट गए
न कोई मित्र न कोई बंधु
कैसा होगा इनका साथ ?
यही सोच भर आये आँसू
नटखट था रोहित ,
पर समझदार भी था बहुत
मन की पीड़ा भाँपी उसने
समझा दर्द बेजुबान वानर का
प्यार से थामा हाथ सचिन का
उतार पेड़ से दिया खाने को
बच्चा टोली हो गई उसकी
वो हो गया बच्चा टोली का
पर,
मन में तड़प थी ,था एकाकीपन
दूर भटक बिछड़ा अपनों से
सोच रहा था , ये सब बातें
अनायास आवाज थी आई
मानो माँ ने उसे पुकारा
भूल गया वो दर्द ही सारा
उछला-कूदा , दौड़ा-भागा
हो गया अपने झुण्ड में शामिल
माँ से चिपक गया था ऐसे
जैसे बिछड़ा था बरसों से
चूम रही थी माँ भी उसको
झूम रही थी बच्चा टोली
सचिन पास था माँ के अपनी |
ये निरीह प्राणी भी रहते हैं परिवार में
बिछड़ जाए यदि इनका कोई
बस शब्द नहीं होते हैं
पर,
ये भी हमारी तरह ही रोते हैं
समझो इन्हें भी अपने जैसा
जगत लगेगा मीठे सपने सा |




Friday, 17 February 2017

                                 बहादुर रमती
रमती अपने माता-पिता की एकमात्र संतान है | वह बड़ी ही होनहार  एवं बहादुर बच्ची है | माँ नैनी तथा पिता गोपी की संतान रमती अपने नाम के अनुरूप ही सबके ह्रदय में रमती है | जब नैनी ने रमती को जन्म दिया था तभी गोपी से वचन लिया था कि हम अपनी बेटी को खूब पढ़ाएंगे और रमती का कोई भाई-बहन नहीं होगा | अतः रमती अकेली है | रमती के माता-पिता निरक्षर हैं | फिर भी अपने वचन के अनुसार उन्होंने रमती का दाखिला गाँव के विद्यालय में करवा दिया | रमती शुरू से ही मेधावी छात्रा थी वह पढाई के अलावा विद्यालय में होने वाली हर गतिविधि में भाग लेती और पुरस्कार भी जीतती | माता-पिता अपनी पुत्री की सफलता देख-देखकर फूले न समाते | धीरे-धीरे रमती बड़ी हो रही थी | गाँव में कोई भी अच्छा चिकित्सालय नहीं है | रमती को यह बात बड़ी कचोटती है कि गाँव के हर व्यक्ति को छोटी-छोटी बीमारी की चिकित्सा के लिए पास के शहर में जाना पड़ता है | रमती ने डॉ बनकर मानव सेवा करने का निश्चय किया | गाँव से शहर जाने के लिए न तो पक्की सड़क है न ही कोई यातायात का ऐसा साधन जो जल्दी ही हस्पताल पहुंचा दे | प्रगतिशील देश होने के बाद भी उसके गाँव की ऐसी दशा है | हाँ एक बात अच्छी है कि उसके विज्ञान के अध्यापक बहुत ही सुलझे विचारों के हैं | वे अपने छात्रों को नई दिशा देने का भरसक प्रयास करते हैं | उन्हीं के प्रयासों के कारण ही विद्यालय में चित्रकला, संगीत, पाककला तथा आत्मसुरक्षा के लिए भी प्रशिक्षण दिया जाने लगा है | रमती ने भी अपनी रूचि के अनुसार तैराकी एवं कराटे के प्रशिक्षण के लिए अपना नाम दे दिया | अब वह प्रतिदिन तालाब में तैरने का अभ्यास करती और सप्ताह में दो दिन कराटे की कक्षा में जाती | तैराकी में रमती काफी निपुण हो चुकी थी |
एक दिन रमती प्रतिदिन की भांति अभ्यास के लिए घर से निकली | वह तालाब के पास पहुँची ही थी कि उसका मन अपनी आगे की पढाई के बारे में सोचने लगा | वह मन ही मन योजना बना रही थी कि डॉ बनने के लिए बहुत पैसों की जरुरत होती है ,जो उसके माता-पिता के पास नहीं हैं | “काश उसे छात्रवृत्ति मिल जाए”| वह विचार कर ही रही थी कि अचानक उसे “छपाक “ पानी में किसी के कूदने की आवाज आई | उसने वहाँ से अपना ध्यान हटाया और पुनः अपनी योजना  पर ध्यान केन्द्रित करने लगी |
उसने फिर से “बचाओ-बचाओ” चिल्लाने की आवाज सुनी | रमती को लगा कि जरुर कोई गड़बड़ है | वह भागकर  हुए तालाब में कूद गई और डूबते बच्चे को किनारे निकाल कर ले आई| | अभी तक उसका मस्तिष्क केवल डूबने वाले को बचाने में लगा था | प्राथमिक उपचार के समय रमती ने देखा कि यह तो निखिल है अशोक चाचा का बेटा | जो अभी कक्षा दस में है | इसकी तो परीक्षा आने वाली हैं और यह इस हाल में! यह कदम निखिल ने क्यों उठाया ? रमती का दिमाग घूम रहा था | खैर वह निखिल को घर तक ले आई | तब तक निखिल के डूबने तथा रमती द्वारा उसे बचाने की बात पूरे गाँव में आग की तरह फैल चुकी थी |
अशोक चाचा-चाची निखिल के इस कदम से बदहवास से थे | वे हैरान थे कि निखिल ने यह कदम क्यों उठाया | उन्हें यह तो पता था कि निखिल की बोर्ड की परीक्षा आरम्भ होने वाली है और उसी ने बताया था कि उसकी तैयारी कोई ख़ास नहीं हो पा रही है | उन्होंने निखिल को कुछ न कहा न कुछ पूछा बल्कि रमती को निखिल की जान बचाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद दिया | उस दिन तो रमती ने भी निखिल से कोई बात नहीं की ,किन्तु उसने मन ही मन निश्चय किया कि वह इस विषय में निखिल से बात अवश्य करेगी | गाँव में चारों तरफ  रमती की बहादुरी की चर्चा हो रही थी | बड़े क्या ,बूढ़े क्या ,नौजवान, बच्चे  सभी की जुबान पर रमती की बहादुरी की चर्चा थी | वहीँ रमती के माता-पिता अपनी बेटी की प्रशंसा सुन-सुनकर गौरवान्वित हो रहे थे |
एक दिन मौका देखकर रमती ने निखिल से “उस घटना ” के बारे में बात की तो निखिल रो पड़ा | उसने रमती के सामने अपने मन की सारी बात रख दी | उसकी बातें सुनकर रमती हतप्रभ रह गई | निखिल भी डॉ बनना चाहता है किन्तु उसके माता-पिता भी आर्थिक रूप से कमजोर हैं | वह यह तो सोच रहा था कि मेडिकल की पढाई में पैसा बहुत लगेगा तो कहाँ से आएगा किन्तु यह नहीं सोचा उसने कि इसके लिए कक्षा दस की पढाई भी अत्यावश्यक है | जब दसवीं ही पास नहीं करेगा तो आगे की पढाई कैसे करेगा | रमती ने उसे समझाया ,कहा अभी भी बहुत समय है | तुम चाहो तो सब कुछ हो सकता है ,दृढ निश्चय के साथ संकल्प करो और अपने उददेश्य को पाने के लिए पूरे मन से जुट जाओ | सफलता तुम्हारे पीछे स्वयं आएगी | “जीवन समाप्त करना कायरों का काम है , कठिनाइयों में रास्ता खोजना ही बहादरी है |” रमती की बातें इतनी प्रभावशाली थीं कि निखिल के मन घर कर गई | एक नई चेतना ,नया आत्मविश्वास से भरा नजर आ रहा था निखिल | एक दृढ संकल्प के साथ उसने पढ़ाई आरम्भ की | रमती ने उसे आश्वासन दिया कि वह हर संभव उसकी सहायता करेगी | बस निखिल को अपने-आप पर भरोसा रखना है |
गाँवभर में रमती की बहादुरी की चर्चा तो थी ही , इस बार सरपंच जी ने छब्बीस जनवरी पर सम्मानित होने वाले बहादुर बच्चों के नाम में रमती का नाम भेज दिया | जब दिल्ली पत्र पँहुचा तो कुछ ही दिनों के बाद निरिक्षण के लिए एक टीम गाँव आ पहुँची | सारी खोजबीन के पश्चात टीम ने सब कुछ सही पाया तो रमती को बहादुरी का पुरस्कार मिलना निश्चित हो गया | दिसम्बर का महिना चल रहा था | बस अब कुछ दिनों की बात है ,हम सब टी वी पर रमती को देखेंगे | सबकी यही सोच थी ,नये वर्ष से ज्यादा रमती को टी वी पर देखना और राष्ट्रपति से पुरस्कार लेते हुए देखने की लालसा हर ग्रामवासी की थी | हो भी क्यों न रमती के कार्यों से सबका मस्तक जो ऊँचा हो रहा है |

आखिर वो दिन भी आ ही | सभी बहादुर बच्चों के साथ रमती को बहादुरी का पुरस्कार मिला | माता-पिता गर्व प्रसन्न हो रहे थे | गाँव लौटने पर रमती का स्वागत ढ़ोल-नगाड़े के साथ हुआ | पूरे गाँव में उत्सव का माहौल था | निखिल,चाचा-चाची सब उसके स्वागत में तत्पर थे | निखिल की जान बचाने के लिए मानो खुले ह्रदय से दुआ एवं धन्यवाद दे रहे थे | निखिल  रमती का आभार प्रकट कर रहा था | रमती पहले से ही सबकी प्रिय थी फिर आज की बात तो निराली ही थी | रमती ने भी सबका मान रखा और पुरस्कार की राशि गाँव के विकास के लिए दे दी |