Thursday, 18 January 2018


       तरुवर हमारे , सच्चे सहचर

रोहन की दादी का पूरी सोसाइटी में बड़ा सम्मान था | बच्चे क्या,बूढ़े क्या हर कोई उनकी बात को मानते थे | पर बाल-मन तो बाल मन ठहरा उन्मुक्तता , मासूमियत तथा कुछ भी कर गुजरने की फितरत इन बच्चों में भरी पड़ी थी | इसलिए थोड़े निरंकुश भी थे | जब चाहे पार्क में खेलते यूँ ही घुमते समय पेड़-पौधों को नुक्सान पहुँचाते रहते थे | वे प्रायः देखा करती थीं कि बच्चे पार्क में खेलते समय अक्सर पेड़ों की डालियाँ , पत्ते एवं फूलों को बेरहमी से तोड़ डालते थे | बहुत विचार करने के बाद दादी ने उन्हें सुधरने की युक्ति निकाली और उन्हें वास्तविकता पर आधारित कहानी सुनानी आरम्भ की |
 मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक पक्का साथ निभाते हैं ये वृक्ष, निशब्द रहकर अपना कर्तव्य निभाते रहते हैं | जीवित रहने के लिए प्रत्येक प्राणधारी को अनवरत प्राणवायु प्रदान करते हैं | तो चलो बच्चों आज इन वृक्षों की परोपकारी प्रवृत्ति की कहानी बताती हूँ | रोहन की दादी ने रोहन और उसके दोस्तों को बताया तो छोटे-छोटे बच्चे आश्चर्य से दादी का मुँह ताकने लगे | उन्हें तो कभी किसी ने बताया ही नहीं था कि वृक्षों की हमारे जीवन में कितनी महत्ता है | सभी की आँखें बड़ी उत्सुकता से दादी की ओर देख रही थी और वे सब दादी की बात शुरू होने की प्रतीक्षा कर रहे थे | दादी ने अपनी बात संत कबीर के इस दोहे से आरम्भ की
तरुवर फल नहीं खात हैं , सरवर पियत न नीर |
परमारथ  के कारने संतन , धरा सरीर ||
समझे बच्चों ! दादी ने पूछा तो आदित्य ने कहा दादी थोड़ा-थोड़ा समझ आया पूरा नहीं | दादी ने कहा मैं बताती हूँ कि पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते , नदियाँ जल स्वयं नहीं पीतीं ,परोपकार करने के लिए ही अच्छे मनुष्य जन्म लेते हैं | हमारी प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया है बस जरूरत है तो उसे सहेजने की , संभालकर रखने की | प्रकृति का एक बहुत ही ख़ास हिस्सा हैं तरुवर | आज विश्व में बाढ़ आदि की जो समस्या होती है न उसे रोकने में ये बहुत सहायक होते हैं क्योंकि ये मिटटी के कटाव को रोकते हैं ,जहाँ वृक्षों के घने जंगल होते हैं वहाँ मवेशियों (जानवरों) के लिए चारा (भोजन )मिलता है | वृक्ष अप्रत्याशित रूप से हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं क्योंकि ये स्वयं को कीटों से बचाने के लिए फाइनटोनसाइड रसायन हवा में छोड़ते हैं , इसमें एंटी बैक्टीरियल खूबी होती है | साँसों के जरिये जब ये हमारे शरीर में जाता है तो हमारी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है | दादी ने कहा यह तो तुम लोग भी जानते हो न कि वृक्ष प्रदूषण को कम करते हैंसब बच्चे एक साथ बोल उठे हाँ-हाँ दादी ये वातावरण से कार्बनडाईऑक्साईड सोख कर उसे ऑक्सीजन में बदल देते हैं, और हमें शुद्ध प्राणवायु देते हैं”| दादी ने सबको शाबाशी दी और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोलीं पता है बच्चों यदि किसी के घर के आस-पास घने पेड़ लगे हों तो गर्मियों में उस घर में बिजली का बिल कम आता है | “ऐ ! निशि ने कहा ऐसा कैसे हो सकता है दादी , बिजली के बिल का पेड़ों से क्या मतलब” | दादी ने कहा है मतलब , वो ऐसे कि घर के आस-पास पेड़-पौधे लगाने से बगीचे से वाष्पीकरण बहुत कम होता है| “ये वाष्पीकरण क्या होता है दादीनलिन ने पूछा | दादी कुछ कहती उनसे पहले मिनी बोल उठी इवेपोरेशन होता है ये | इससे हमारी धरा तक सूर्य की किरणें सीधी नहीं पहुँच पाती और  पानी को भाप बना कर नहीं उड़ा पातींक्यों दादी ऍम आई राईट”| दादी ने कहा मिनी यू आर अब्सोल्युटली राईट”| इसके अलावा तरु सूर्य की हानिकारक किरणों से भी हमारा बचाव करते हैं | सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें हमारी त्वचा को बहुत हानि पहुँचाती हैं, ये किरणें त्वचा के कैंसर के लिए जिम्मेदार होती हैं | स्कूलों तथा पार्कों में घने वृक्ष होने से बच्चे इन हानिकारक किरणों से बचे रहते हैं | वृक्षों की पत्तियाँ,टहनियाँ और शाखाएँ तेज शोर को रोकती हैं तथा तेज बारिश की गति को धीमा कर धरती की मिटटी को कटने से बचाती हैं | पेड़ों की पत्तियाँ , तने और जड़ें पक्षियों ,जानवरों तथा कीट-पतंगों को रहने के लिए घर देते हैं | विकास के चक्कर में हम पेड़ों को काटते तो जा रहे हैं पर लगाते नहीं हैं और लगाते भी हैं तो उनकी देखभाल सही तरीके से नहीं करते जिससे वे मर जाते हैं |
अब बात यह है कि जब ऐसे तरुवर जो कि वास्तविक अर्थों में हमारे सच्चे मित्र हैं , ये अपनी मित्रता निभाते हैं तो क्या हमारा कर्तव्य नहीं है कि हम इन्हें बचाएँ और नये पेड़ लगाकर धरती को हरा-भरा बनाएँ |
सभी बच्चे दादी की इन बातों को बड़े ही ध्यान से सुन रहे थे | वे सचमुच बहुत प्रभावित थे इन बातों से | वे आपस में कहने लगे कि यार दादी की बातों में दम तो है तो क्यों न हम पेड़ों को बचाने का कार्य करें और नये भी लगाएँ | सबने एक साथ पेड़ों को बचाने एवं नये लगाने की शपथ ली | दादी के चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान फ़ैल रही थी क्योंकि उन्होंने आज अपने लक्ष्य की पहली सीढ़ी पार कर ली थी | उन्होंने इन मासूमों को राह पर लाने के लिए यह राह चुनी थी |  उन्हें अपनी  मंजिल स्पष्ट दिखाई दे रही थी |     


Wednesday, 17 January 2018

छोटा मुन्नू, काम बड़े 
मुन्नू का परिवार साधारण था | पिताजी सब्जी बेचने का काम करते थे और माँ साड़ियों में फौल-पीको का काम करती थीं | मुन्नू की एक बहन थी जो उससे लगभग चार साल बड़ी थी और एक भाई जो उससे तीन साल छोटा था | माता-पिता अपने-अपने काम तथा परिवार के प्रति पूरी तरह समर्पित थे |तीनों भाई-बहन पढ़ाई के साथ-साथ समय-समय पर माता-पिता की सहायता भी करते थे | मुन्नू छुट्टी वाले दिन पिताजी की साथ थोक मंडी जाकर सब्जी लाता और दुकान लगाने में मदद करता | दोपहर में पिताजी को आराम करने के लिए घर भेज स्वयं दुकान संभालता | इसी प्रकार दीदी भी माँ के काम में हाथ बँटाती | जिन्दगी ठीक चल रही थी | माता-पिता अपने बच्चों के व्यवहार तथा उन्नति से संतुष्ट थे | तीनों ही बच्चों ने संस्कार तो मानो घुट्टी के साथ ही पी लिए थे | उनके व्यवहार तथा आचरण से लगता नहीं था कि उनके माता-पिता दोयम दर्जे का कार्य करते हैं | विद्यालय या अन्य कहीं पूछे जाने पर मन्नू बड़े ही फक्र से अपने माता-पिता के बारे में बताता, वह बिलकुल भी नहीं छुपाता उनके कार्य को और न ही उसे लज्जा महसूस होती | बल्कि वह कहता कि “ मेरे माता-पिता जो कार्य कर रहे हैं वह कोई छोटा नहीं है ,आखिर वे हम बच्चों के लिए ही तो इतना परिश्रम कर रहे हैं, तो हम बच्चों का भी कर्त्तव्य है कि हम उनके सपने साकार करें”| वह बड़े ही गर्व से कहता “ देखना मैं एक दिन इंजीनियर बनूँगा, आई-आई टी कानपुर में पढूँगा”| उसके आत्मविश्वास को देख माता-पिता ख़ुशी से फूले नहीं समाते | वे ईश्वर से प्रार्थना करते कि ईश्वर उनके बच्चों की हर इच्छा को पूरा करें |
मुन्नू का परिवार एक गरीब बस्ती में रहता था | एक दिन जब मुन्नू विद्यालय जा रहा था तो उसने देखा कि खुदाई करने की मशीनें आ रहीं हैं | उसकी बस्ती में एक बहुमंजिला सरकारी भवन बनाने का कार्य शुरू होने जा रहा था ,आज भूमि पूजन था | यह एक बहुत बड़ी परियोजना थी , जिसमें गरीबी की रेखा से नीचे लोगों के आवास एवं रोजगार हेतु कार्य आरम्भ होने जा रहा था | लौटने पर उसने देखा कि खुदाई का काम चालू हो चुका है| रात होने पर मजदूरों ने मशीनें एक तरफ लगाईं और चले गए | बहुत थोड़ा ही काम हुआ था , दुर्घटना की कोई संभावना नहीं थी | दूसरे दिन निर्धार्रित समय पर काम चालू हो गया | मुन्नू जब विद्यालय से लौटा मजदूर खाना खा रहे थे और एक बहुत बड़ा गढ्डा खुद चुका था | उसे देखते ही मुन्नू के दिमाग में बिजली सी कौंध गई कि इसमें तो कोई भी गिर सकता है, जान जा सकती है किसी की | कुछ करना चाहिए | क्योंकि मुन्नू ने टी वी पर देख और सुन रखा था कि “गढ्डे में गिरकर एक मासूम की मौत”|
इस तरह की घटनाएँ आए दिन होती रहती हैं | मुन्नू ने अपना बस्ता एक तरफ रखा और तुरंत अपने दोस्तों के साथ मिलकर पेड़ों की टहनियों से गढ्डे की घेराबंदी कर दी और लोगों के आने जाने का रास्ता बदल दिया | क्योंकि बच्चों का विद्यालय से वापस आना शुरू हो चुका था |
जब सुपरवाइजर का ध्यान उस तरफ गया तो वह हक्का-बक्का रह गया कि उसके आदमियों ने जो भूल की थी उसे इन छोटे बच्चों ने कैसे सुधारा| वह मुन्नू और उसके दोस्तों से बहुत खुश हुआ और अपने आदमियों पर बरसने लगा कि “ तुम लोगों ने खाने पर जाने से पहले - इस तरफ कोई न आए काम चालू है का बोर्ड क्यों नहीं लगाया ?” मुन्नू ने उन्हें रोकते हुए कहा कि “ अंकल इन्हें कुछ न कहिये क्योंकि दिन भर लगातार काम करने पर जो भूख लगती है तो कुछ याद नहीं रहता, इन्हें खाना खाने दीजिये ये सब  मेहनत करके थक गए हैं |” मुन्नू ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि “ हम भी तो इस देश के नागरिक हैं हमारा  भी तो कुछ कर्त्तव्य है |” छोटे मुन्नू की बड़ी बातें सुपरवाइजर को छू गई| उसने मुन्नू और उसकी टीम को ह्रदय से धन्यवाद दिया और कहा कि “आज तुम लोगों के कारण बड़ा हादसा होने से टला है, क्योंकि यह समय तो बच्चों के विद्यालय से घर लौटने का है और घर आने की ख़ुशी में बच्चे जिस तरह दौड़ते हैं बस .................... बाप रे ! कुछ भी हो सकता था |” उसने मुन्नू और उसके दोस्तों को एक-एक चौकलेट दी और उन सबसे पूछा कि वे बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं | सबने अपने-अपने सपने साझा किए | सुपरवाइजर अंकल ने सबको आशीर्वाद दिया कि “ तुम सब एक दिन जरूर सफलता प्राप्त करोगे | बस ईमानदारी से कार्य करते रहो और अपने कर्तव्यों का पालन करना , सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी |”
सुपरवाइजर मुन्नू और उसकी टीम से अत्यधिक प्रभावित थे ,उनके  मन में भी इन बच्चों तथा इनके परिवारों के लिए कुछ करने की प्रबल इक्छा जागृत हो रही थी | बहुत विचार करने के बाद वे इस निष्कर्ष पर  कि इस परियोजना में वे एक पार्क तथा एक पुस्तकालय भी बनवाने की योजना के लिए सरकार से आवेदन करेंगे | उन्होंने इसे पूरा करने के लिए अथक प्रयास किए | उनके प्रयास से बच्चों  तथा वृद्धों के लिए पार्क भी बना तथा खाली समय में जो लोग ज्ञानवर्धन हेतु पढ़ाई करना चाहते हैं उनके लिए पुस्तकालय में सभी सुविधाओं की व्यवस्था भी हो गई | इस प्रकार मुन्नू की होशियारी के कारण सभी की सुरक्षा के प्रति जागरूकता तो बढ़ी ही साथ ही उनके लिए उन्नति के द्वार भी खुल गए |   
  

Thursday, 29 June 2017

एक था राहुल

राहुल अपने परिवार का बड़ा ही लाडला बच्चा था ,किन्तु था बड़ा ही शरारती | दिमाग बहुत ही तेज था किन्तु शरारतों के कारण हमेशा खुराफ़ात में ही लगा रहता था | कभी अपनी कालोनी के बच्चों के पीछे गली के कुत्ते लगा देता तो कभी विद्यालय में नकली छिपकली से शिक्षकों को डरा देता | हर दिन उसके दिमाग में नई-नई शरारतें जन्म लेतीं थी | सबको खूब परेशान करता और दूसरों को परेशान देख बहुत खुश होता | उसकी इन हरकतों से सब परेशान थे | आए दिन उसके मम्मी-पापा को विद्यालय बुलाकर उसकी शिकायत की जाती, तो कभी कॉलोनी के बड़े-बुजुर्ग उसके पिताजी को ढ़ेरों नसीहतें दे डालते पर उस पर कोई असर नहीं होता | माँ का तो जैसे घर से निकलना ही दूभर हो चला था |
           राहुल भी अब छोटा न रहा , वह भी किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख रहा था | पर उसकी शरारतों में कोई कमी न आई | एक दिन उसके खुराफाती दिमाग में कुछ गलत करने की कुलबुलाहट हो रही थी , तभी उसको एक नेत्रहीन बुजुर्ग दिखाई दिए | बुजुर्गों से उसे वैसे ही कुछ नफरत सी थी , क्योंकि वे उसकी शिकायत उसके पिता से जो करते थे | खैर आज उसने कुछ अलग करने का सोचा और उसने नेत्रहीन बुजुर्ग को रास्ता पार कराने के बहाने सड़क के बीच बैठे आवारा पशुओं के पास छोड़ने का निर्णय लिया | अगले ही क्षण उसने बड़े ही विनम्र भाव से बाबाजी से आग्रह किया कि क्या वह उनकी कोई सहायता कर सकता है ? बुजुर्ग की सहमति मिलते ही उसने सड़क पार कराने के बहाने आवारा पशुओं के पास ले जाकर छोड़ दिया और बोला “ बाबाजी अब आप सीधे जा सकते हैं “ बाबाजी ने उसे खूब आशीर्वाद दिया |
विवेक बहुत ही सद्विचारों वाला सहृदय एवं विनम्र बालक था | वह अपनी साईकल से घर जा रहा था , जैसे ही उसकी नज़र नेत्रहीन बाबाजी पर पड़ी वह तुरंत ही साईकल से लगभग कूद ही पड़ा और उनका हाथ पकड़कर दूसरी ओर ले गया | अचानक इस तरह होने से बाबाजी कुछ परेशान हो गए , उन्होंने विवेक से पूछा , तो विवेक ने सारी बात बता दी कि वे आवारा पशुओं के झुण्ड के समीप पहुँच रहे थे | बाबाजी ने कहा- “बेटा मेरी ही गलती है , मुझे तो तुम्हारे जैसे ही बालक ने मुझे रास्ता पार करवाया और यहाँ छोड़ा था “ खैर विवेक ने ज्यादा न सोचकर बाबाजी को उनके गंतव्य तक छोड़ दिया जहाँ उनके साथी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे | इसी बीच राहुल ने सोचा कि अब ज़रा देखा तो जाए कि बाबाजी का क्या हुआ ? वह यह सब सोच रहा था और बड़ा खुश था कि “अहा ,बड़ा मज़ा आएगा “ वह इसी में खोया हुआ था उसका ध्यान सड़क पर था ही नहीं कि एक सांड बड़ी तेजी से उसकी ओर बढ़ रहा था | विवेक भी बड़ी जल्दी में था किन्तु जैसे ही उसने सांड को राहुल की तरफ आते देखा तो उसने राहुल को दूसरी ओर धक्का दे दिया , राहुल कुछ समझ पाता कि सांड तेजी से उसके पास से निकल गया , राहुल बाल-बाल बच गया था | विवेक ने साईकल एक ओर  खड़ी कर राहुल को सहारा देकर उठाया और पुछा कि-“ भाई ध्यान कहाँ था तुम्हारा , अभी तुम्हें कुछ हो जाता तो तुम्हारे माता-पिता कितने परेशान हो जाते “ | राहुल ने उसे धन्यवाद दिया | राहुल ने सड़क पार निगाह डाली तो विवेक ने पूछा कि “किसे ढूंढ़ रहे हो “ राहुल ने विवेक को बुजुर्ग के बारे में बताया तो विवेक ने कहा-“ तुम उनकी चिंता मत करो वे सुरक्षित हैं मैंने उन्हें उनके मित्रों तक पहुँचा दिया है, चलो तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देता हूँ |” यह कहकर विवेक ने राहुल को अपनी साईकल पर बिठा लिया | विवेक ने राहुल को कहा कि वह पहले अपने माता-पिता को बताएगा कि वह कहाँ एवं क्यों जा रहा है अन्यथा वे व्यर्थ ही चिंता करेंगे | जैसे ही विवेक ने अपनी कॉलोनी में प्रवेश किया छोटे बच्चे विवेक भैया विवेक भैया  कहकर उसे बुला रहे थे वह भी सबसे हँसकर बोल रहा था | रास्ते में उसे जो भी बड़े-बुजुर्ग मिलते वह उन्हें प्रणाम कर रहा था वे भी उसे आशीर्वाद दे रहे थे | रास्ते में राहुल सोच रहा था कि विवेक उसकी ही उम्र का है किन्तु उसमें और विवेक में कितना फर्क है | विवेक जैसे ही घर पहुँचा द्वार पर ही उसके पिताजी मिल गए , विवेक ने संक्षेप में उन्हें सारी घटना बता दी और कहा कि वह राहुल को उसके घर छोड़कर जल्दी ही वापस आ जायेगा |
जब विवेक अपने पिता को सारी बातें बता रहा था तो विवेक के पिता के चेहरे पर गर्व के भावों को राहुल ने बखूबी देखा और उसे बड़ा ही बुरा लगा कि –“ एक मैं हूँ जिसके माता-पिता को मेरी वजह से आए दिन शर्मिंदा होना पड़ता है “| उसका मन आत्मग्लानि से भर उठा | उसने निर्णय लिया कि वह भी विवेक की भांति बनेगा | उसके माता-पिता भी उस पर गर्व कर सकेंगे | विवेक की कुछ ही देर की संगति ने राहुल का ह्रदय परिवर्तन कर दिया |

 सच ही कहा है रहीम दास जी ने कि -
कदली सीप भुजंग मुख स्वांति एक गुन तीन 
जैसी संगति बैठिये तैसो ही फल दीन्ह |

Saturday, 4 March 2017

                           एक प्रयास ऐसा भी (कहानी)
पड़ोस में रहने वाली प्रज्ञा के घर से रोज ही बच्चे  के रोने की , बुजुर्गों को मिलने वाली नसीहतों की और घर में काम  करने वाली क्षमा दीदी को दिनभर क्या-क्या करना है , बेटे को क्या खिलाना है, कब नहलाना है ,कब सुलाना है, माँ–बाबूजी को क्या खाना देना है,कब कौन सी दवाई देनी है आदि आदि निर्देशों की आवाजें रोज सुबह-सुबह आतीं हैं | प्रज्ञा मल्टी नॅशनल कम्पनी में उच्च पद पर है ,उसका पति प्रवीन भी सरकारी नौकरी में है | दोनों पति पत्नी अच्छा  पैसा कमाते  हैं | दोनों की कमाई तो अच्छी हो रही है ,पैसे की कमी नहीं है बस यदि कमी है तो रिश्तों में आत्मीयता की |
रानी रोज-रोज यह सब देखती –सुनती तो उसका मन बड़ा ही विचलित हो जाता | एक दिन उसके मन की उथल-पुथल कुछ अधिक ही बढ़ गई | वह बड़ी ही गंभीरता से विचार करने लगी | अचानक उसके कानों में टी वी पर आते डायपर के विज्ञापन की आवाज पड़ी ,उसका तो मानो मन ही खिल उठा, जैसे उसे समाधान के पिटारे की चाबी मिल गई | वह इन डायपरस के इर्द-गिर्द समस्या का समाधान ढूंढने लगी | रानी सोच रही थी कि प्रज्ञा बेटे को दिन-रात डायपर पहनाकर रखती है | उसके जाने के बाद क्षमा कितनी बार चेक करती है कि बेटा कहीं गंदगी में तो नहीं है | यह प्रज्ञा को बिलकुल नहीं पता | क्षमा भी क्या करे ,सारे घर की और घर के हर सदस्य की जिम्मेवारी उसी की है | आखिर वह भी तो इंसान है ,उसका भी तो घर-परिवार है |
डेढ़ साल का बेटा है प्रज्ञा का | इन डायपरस में ये मासूम कितना झेलता है अपनी ही गंदगी को | रानी का दिमाग भन्ना रहा था | स्वर्ग-नरक की बातें उसे भ्रमित कर उसके दिमाग पर लगातार चोट कर रही थीं कि कितनी कठिनाइयों को झेलकर माँ एक बच्चे को जन्म देती है | माँ के उदर में शिशु भी तो कितने कष्ट में रहता है , उल्टा लटका रहता है और सभी तरह के कष्ट झेलने के पश्चात नौ माह बाद संसार में जन्म लेता है | और फिर सिलसिला शुरू हो जाता है इन डायपरस के साथ जीने का | कामकाजी महिलाएँ इतनी अभ्यस्त हैं इन डायपरस के प्रयोग  की कि दिन हो या रात बेचारे शिशु को इनसे छुटकारा नहीं मिलता | वह कहे भी तो कैसे उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता अभी विकसित नहीं हुई है | एक गंदगी से निकलकर बेचारा दूसरे दल-दल में जा फंसा है | न जाने ऐसे कितने ही प्रश्न रानी को व्यथित कर रहे थे | वह सोचने लगी हमारा ही समय ही अच्छा था कि हम अपने बच्चों को कपड़े से बनी मुलायम नैपी पहनाते थे और गीली होने पर तुरंत बदल देते थे | नैपी बदलना एक काम अवश्य था किन्तु इस बहाने माँ का स्पर्श कितनी सुखद अनुभूति देता था शिशु को | दोनों का रिश्ता दिनोंदिन मजबूत होता जाता था | दोनों के बीच निरंतर एक मूक संवाद तथा प्यार का आदान-प्रदान होता था | शिशु पूरी तरह से माँ पर आश्रित होता है किन्तु जब तक माँ का समर्पण नहीं होगा यह रिश्ता खोखला ही रहेगा | बार-बार माँ का स्पर्श ,उसकी आवाज , उसकी आहट ,सबका पता होता है शिशु को | माँ के स्पर्श के साथ ही माँ-बच्चे में एक गहरा नाता जुड़ जाता है | अपने हाथों से नहलाना ,कपड़े पहनाना ,खाना खिलाना ,लोरी सुनाकर सुलाना ,बार-बार प्यार से चूमना ,जरा सा रोने पर गोद में उठा कर सर पर प्यार से हाथ फेरना | ऐसी ही न जाने कितनी ही बातें माँ-बच्चे के बीच अटूट रिश्ता बना देती थीं | एक दूसरे  को बिलकुल नजदीक ला देती थीं | इतनी कि दोनों को एक दूसरे बिना अधूरा बना देती थी | और आज का जमाना रानी सोच रही थी  बाप रे! क्या है | सिर्फ मशीन बनकर रह गई  है माँ , पैसे कमाने की मशीन | अपनी ममता लुटाने के बजाय आया की गोद दे दी | आया को अपनी तनख्वाह से मतलब है न कि बच्चे की सही देखभाल से | माँ की अनुपस्थिति में जब बच्चा रोता है तो उसे डांट-डपटकर जबदस्ती चुप कराती है | उसके पास माँ के जैसी कोमल भावनाओं का ममता भरा स्पर्श नहीं होता ,जो बच्चे को भावनात्मक रूप से सपोर्ट कर मानसिक शांति दे सके | उसे अहसास करा  पाए कि बेटा चुप हो जा तेरी माँ तेरे साथ है | गंद से भरे डायपर में बच्चे की छटपटाहट का पता ही नहीं चलता कि वो कहने की कोशिश में है कि इस गंदगी से मुझे मुक्त करो | ऐसे कितने ही किस्से हैं भावनाओं से जुड़े | आज समाज में क्या दे रहीं हैं माएँ अपने बच्चों को | हाँ एक बात सौ प्रतिशत सही है कि आप जो देते हैं वही बढ़कर आपको वापस मिलता है | कहते हैं न कि “बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से पायें |”  सही बात है आज हम जो अपने बच्चों को डायपर पहना रहे हैं तो कोई बड़ी बात नहीं होगी यदि भविष्य में वो हमें पहनाएँ | क्योंकि बचपन और बुढ़ापा एक-दूसरे के पर्याय हैं | हे भगवान ! यह सब सोच-सोचकर रानी की बैचैनी बढती ही जा रही है | इस युग में हमने पाश्चात्य संस्कृति को अपनाकर जो भूल की है वह आज हमारे सामने एकाकी परिवार और वृद्धाश्रम के रूप में है | हम चाहते तो हैं बहुत कुछ करना पर होता कुछ और ही है | कुछ भी सहज नहीं है ,सब कुछ बनावटी है | आज हमारे पास बच्चों के लिए समय नहीं है कल उनके पास हमारे लिए नहीं होगा तब कोसने का क्या लाभ होगा | बस आज सुधारो ,कल अपने आप सुधर जाएगा |

मन में उठते इन बवंडरों के साथ रानी बड़े ही पशोपेश में थी | अचानक वह उठ खड़ी हुई एक नए संकल्प के साथ कि वह महिला मंडल के साथ इस विषय पर चर्चा करेगी और बच्चों और बुजुर्गों के प्रति प्रेम और सौहार्द की अलख जगाएगी | नई पीढ़ी को सुधारने हेतु उसकी महिला मंडली कदम उठाएगी , बिखरते-टूटते परिवारों तथा रिश्तों को सहेजने का प्रयास करेगी | भले ही यह कदम छोटा होगा ,किन्तु इसके परिणाम दूरगामी तथा सुखद ही होंगे |

  


Saturday, 18 February 2017

                        काव्य –कथा 
                      अनूठे मित्र 
सचिन नाम का था एक बंदर,
गलती से,
घुस आया कालोनी के अंदर
वहाँ,😀
हरा-भरा पार्क था सुंदर,
ऊँचे-बड़े फलदार पेड़ देख,
लालच आया उसके अंदर,
उसने,
लोगों को बैठे जब देखा
कुछ सकुचाया, और घबराया
छिप बैठा घने पेड़ के अंदर
हो चली थी सुबह से दोपहर
भूखा था,
पर उसने किया नियंत्रण,
दिया दिलासा अपने आप को,
घर जायेंगे जब मानव सारे,
चैन से खायेगा फल खूब सारे,
यही सोच,
हो चली अब शाम
भूख ने उसको किया हताश
बार-बार सोचे यह बात,
उसको जाने दो , तब तोडूंगा |
अरे ! अब ये आ गया !
इसको भी जाने दो तब खाऊंगा
पर,
आना-जाना थमा नहीं,
बढ़ी भूख पर रुकी नहीं |
उफ़! यह क्या ?
बच्चों की टोली भी आई
धमा-चौकड़ी खूब मचाई
गेंद को सब-मिल खूब उछालें
इधर से मारें उधर से मारें
अ र र र र र र यह क्या !
सरपट आई सचिन के पास
खो बैठा वह होश-हवास
वापस उसने गेंद उछाली
बच्चों की टोली पर मारी
सब बच्चे थे खूब शरारती
पर,
बंदर देख टोली सकपकाई
रोहित सबसे नटखट बालक
पलक झपकते चढ़ा पेड़ पर
हाथ बढ़ाया तरफ सचिन के
पूछ रहा था दोस्त बनोगे ?
भूख से मारा, सचिन बेचारा
सोच रहा था छूट गया घर
माता-पिता भी छूट गए
न कोई मित्र न कोई बंधु
कैसा होगा इनका साथ ?
यही सोच भर आये आँसू
नटखट था रोहित,
पर समझदार भी था बहुत
मन की पीड़ा भाँपी उसने
समझा दर्द बेजुबान वानर का
प्यार से थामा हाथ सचिन का
उतार पेड़ से दिया खाने को
बच्चा टोली हो गई उसकी
वो हो गया बच्चा टोली का
पर,
मन में तड़प थी, था एकाकीपन
दूर भटक बिछड़ा अपनों से
सोच रहा था, ये सब बातें
अनायास आवाज थी आई
मानो माँ ने उसे पुकारा
भूल गया वो दर्द ही सारा
उछला-कूदा, दौड़ा-भागा
हो गया अपने झुण्ड में शामिल
माँ से चिपक गया था ऐसे
जैसे बिछड़ा था बरसों से
चूम रही थी माँ भी उसको
झूम रही थी बच्चा टोली
सचिन पास था माँ के अपनी |
ये निरीह प्राणी भी रहते हैं परिवार में
बिछड़ जाए यदि इनका कोई
बस शब्द नहीं होते हैं
पर,
ये भी हमारी तरह ही रोते हैं
समझो इन्हें भी अपने जैसा
जगत लगेगा मीठा-मीठा  |
नीरा भार्गव 'नीर'




Friday, 17 February 2017

                                 बहादुर रमती
रमती अपने माता-पिता की एकमात्र संतान है | वह बड़ी ही होनहार  एवं बहादुर बच्ची है | माँ नैनी तथा पिता गोपी की संतान रमती अपने नाम के अनुरूप ही सबके ह्रदय में रमती है | जब नैनी ने रमती को जन्म दिया था तभी गोपी से वचन लिया था कि हम अपनी बेटी को खूब पढ़ाएंगे और रमती का कोई भाई-बहन नहीं होगा | अतः रमती अकेली है | रमती के माता-पिता निरक्षर हैं | फिर भी अपने वचन के अनुसार उन्होंने रमती का दाखिला गाँव के विद्यालय में करवा दिया | रमती शुरू से ही मेधावी छात्रा थी वह पढाई के अलावा विद्यालय में होने वाली हर गतिविधि में भाग लेती और पुरस्कार भी जीतती | माता-पिता अपनी पुत्री की सफलता देख-देखकर फूले न समाते | धीरे-धीरे रमती बड़ी हो रही थी | गाँव में कोई भी अच्छा चिकित्सालय नहीं है | रमती को यह बात बड़ी कचोटती है कि गाँव के हर व्यक्ति को छोटी-छोटी बीमारी की चिकित्सा के लिए पास के शहर में जाना पड़ता है | रमती ने डॉ बनकर मानव सेवा करने का निश्चय किया | गाँव से शहर जाने के लिए न तो पक्की सड़क है न ही कोई यातायात का ऐसा साधन जो जल्दी ही हस्पताल पहुंचा दे | प्रगतिशील देश होने के बाद भी उसके गाँव की ऐसी दशा है | हाँ एक बात अच्छी है कि उसके विज्ञान के अध्यापक बहुत ही सुलझे विचारों के हैं | वे अपने छात्रों को नई दिशा देने का भरसक प्रयास करते हैं | उन्हीं के प्रयासों के कारण ही विद्यालय में चित्रकला, संगीत, पाककला तथा आत्मसुरक्षा के लिए भी प्रशिक्षण दिया जाने लगा है | रमती ने भी अपनी रूचि के अनुसार तैराकी एवं कराटे के प्रशिक्षण के लिए अपना नाम दे दिया | अब वह प्रतिदिन तालाब में तैरने का अभ्यास करती और सप्ताह में दो दिन कराटे की कक्षा में जाती | तैराकी में रमती काफी निपुण हो चुकी थी |
एक दिन रमती प्रतिदिन की भांति अभ्यास के लिए घर से निकली | वह तालाब के पास पहुँची ही थी कि उसका मन अपनी आगे की पढाई के बारे में सोचने लगा | वह मन ही मन योजना बना रही थी कि डॉ बनने के लिए बहुत पैसों की जरुरत होती है ,जो उसके माता-पिता के पास नहीं हैं | “काश उसे छात्रवृत्ति मिल जाए”| वह विचार कर ही रही थी कि अचानक उसे “छपाक “ पानी में किसी के कूदने की आवाज आई | उसने वहाँ से अपना ध्यान हटाया और पुनः अपनी योजना  पर ध्यान केन्द्रित करने लगी |
उसने फिर से “बचाओ-बचाओ” चिल्लाने की आवाज सुनी | रमती को लगा कि जरुर कोई गड़बड़ है | वह भागकर  हुए तालाब में कूद गई और डूबते बच्चे को किनारे निकाल कर ले आई| | अभी तक उसका मस्तिष्क केवल डूबने वाले को बचाने में लगा था | प्राथमिक उपचार के समय रमती ने देखा कि यह तो निखिल है अशोक चाचा का बेटा | जो अभी कक्षा दस में है | इसकी तो परीक्षा आने वाली हैं और यह इस हाल में! यह कदम निखिल ने क्यों उठाया ? रमती का दिमाग घूम रहा था | खैर वह निखिल को घर तक ले आई | तब तक निखिल के डूबने तथा रमती द्वारा उसे बचाने की बात पूरे गाँव में आग की तरह फैल चुकी थी |
अशोक चाचा-चाची निखिल के इस कदम से बदहवास से थे | वे हैरान थे कि निखिल ने यह कदम क्यों उठाया | उन्हें यह तो पता था कि निखिल की बोर्ड की परीक्षा आरम्भ होने वाली है और उसी ने बताया था कि उसकी तैयारी कोई ख़ास नहीं हो पा रही है | उन्होंने निखिल को कुछ न कहा न कुछ पूछा बल्कि रमती को निखिल की जान बचाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद दिया | उस दिन तो रमती ने भी निखिल से कोई बात नहीं की ,किन्तु उसने मन ही मन निश्चय किया कि वह इस विषय में निखिल से बात अवश्य करेगी | गाँव में चारों तरफ  रमती की बहादुरी की चर्चा हो रही थी | बड़े क्या ,बूढ़े क्या ,नौजवान, बच्चे  सभी की जुबान पर रमती की बहादुरी की चर्चा थी | वहीँ रमती के माता-पिता अपनी बेटी की प्रशंसा सुन-सुनकर गौरवान्वित हो रहे थे |
एक दिन मौका देखकर रमती ने निखिल से “उस घटना ” के बारे में बात की तो निखिल रो पड़ा | उसने रमती के सामने अपने मन की सारी बात रख दी | उसकी बातें सुनकर रमती हतप्रभ रह गई | निखिल भी डॉ बनना चाहता है किन्तु उसके माता-पिता भी आर्थिक रूप से कमजोर हैं | वह यह तो सोच रहा था कि मेडिकल की पढाई में पैसा बहुत लगेगा तो कहाँ से आएगा किन्तु यह नहीं सोचा उसने कि इसके लिए कक्षा दस की पढाई भी अत्यावश्यक है | जब दसवीं ही पास नहीं करेगा तो आगे की पढाई कैसे करेगा | रमती ने उसे समझाया ,कहा अभी भी बहुत समय है | तुम चाहो तो सब कुछ हो सकता है ,दृढ निश्चय के साथ संकल्प करो और अपने उददेश्य को पाने के लिए पूरे मन से जुट जाओ | सफलता तुम्हारे पीछे स्वयं आएगी | “जीवन समाप्त करना कायरों का काम है , कठिनाइयों में रास्ता खोजना ही बहादरी है |” रमती की बातें इतनी प्रभावशाली थीं कि निखिल के मन घर कर गई | एक नई चेतना ,नया आत्मविश्वास से भरा नजर आ रहा था निखिल | एक दृढ संकल्प के साथ उसने पढ़ाई आरम्भ की | रमती ने उसे आश्वासन दिया कि वह हर संभव उसकी सहायता करेगी | बस निखिल को अपने-आप पर भरोसा रखना है |
गाँवभर में रमती की बहादुरी की चर्चा तो थी ही , इस बार सरपंच जी ने छब्बीस जनवरी पर सम्मानित होने वाले बहादुर बच्चों के नाम में रमती का नाम भेज दिया | जब दिल्ली पत्र पँहुचा तो कुछ ही दिनों के बाद निरिक्षण के लिए एक टीम गाँव आ पहुँची | सारी खोजबीन के पश्चात टीम ने सब कुछ सही पाया तो रमती को बहादुरी का पुरस्कार मिलना निश्चित हो गया | दिसम्बर का महिना चल रहा था | बस अब कुछ दिनों की बात है ,हम सब टी वी पर रमती को देखेंगे | सबकी यही सोच थी ,नये वर्ष से ज्यादा रमती को टी वी पर देखना और राष्ट्रपति से पुरस्कार लेते हुए देखने की लालसा हर ग्रामवासी की थी | हो भी क्यों न रमती के कार्यों से सबका मस्तक जो ऊँचा हो रहा है |

आखिर वो दिन भी आ ही | सभी बहादुर बच्चों के साथ रमती को बहादुरी का पुरस्कार मिला | माता-पिता गर्व प्रसन्न हो रहे थे | गाँव लौटने पर रमती का स्वागत ढ़ोल-नगाड़े के साथ हुआ | पूरे गाँव में उत्सव का माहौल था | निखिल,चाचा-चाची सब उसके स्वागत में तत्पर थे | निखिल की जान बचाने के लिए मानो खुले ह्रदय से दुआ एवं धन्यवाद दे रहे थे | निखिल  रमती का आभार प्रकट कर रहा था | रमती पहले से ही सबकी प्रिय थी फिर आज की बात तो निराली ही थी | रमती ने भी सबका मान रखा और पुरस्कार की राशि गाँव के विकास के लिए दे दी |  

Friday, 23 September 2016

पगली -----------कौन ?

                          पगली -----------कौन ?
वो  दूर के रिश्ते में मेरी ननद लगती हैं | नाम  है गिरिजा | माँ पार्वती का ही दूसरा नाम | अपने नाम के अनुरूप ही उनका व्यक्तित्व | भोली ,ह्रदय से निश्छल तथा सबसे प्रेम करने वाली | अपने निष्कपटी स्वभाव के कारण ही सबको प्रिय हैं | 
बचपन में ही माँ का आँचल छूट गया था | बच्ची की देखभाल अच्छे से हो सोचकर या अपने कर्तव्यों का भार दूसरे को सौंपने की परंपरा के चलते पिता ने दूसरा विवाह रचा लिया | नई  माँ के आने से गिरिजा बड़ी प्रसन्न हुई | माँ ने भी लाड-प्यार में कमी रखी | सब ठीक चल रहा थापूरा परिवार प्रसन्न था | किन्तु विधि का  लिखा कोई पढ़ पाया है , कोई जान पाया है उसकी मर्जी |
समय ने करवट ली | नई माँ ने एक सुंदर-स्वस्थ्य बालक को जन्म दिया | गिरिजा की ख़ुशी का ठिकाना ही रहा | अब तो उसके साथ खेलने वाला ,उससे राखी बँधवाने वाला , भाई -दूज पर टीका करवाने वाला अपना स्वयं का भाई जो गया था | अब उसे किसी की परवाह नहीं थीं | हमेशा अपने भाई के साथ व्यस्त रहती ,उसकी हर ख़ुशी का ध्यान रखती | सब कुछ भूल चुकी थीं गिरिजा | धीरे -धीरे विद्यालय भी छूटने लगा | एक-दो बार तो माँ ने स्मरण कराया कि गिरिजा विद्यालय जाया करो | मनुष्य का स्वार्थ उससे क्या नहीं कराता | माँ ने भी कहना बंद कर दिया | गिरिजा तो जैसे पूरी तरह से घर में ही रच-बस गई | बस अक्षर ज्ञान तक ही उसकी शिक्षा सिमट गई | वह पूरी तरह से माँ के हाथों की कठपुतली थी | कुछ वर्षों के अंतराल पर माँ ने एक-एक कर दो पुत्र एवं दो पुत्रियों को जन्म दिया | सबकी देखभाल तथा घर का काम सब गिरिजा पर पड़ा | गिरिजा सब-कुछ  अच्छे से सँभाल रही थीं | अपने सभी भाई-बहनों की प्रिय जीजी थींबड़ा भाई तो उस पर जैसे जान ही छिडकता था | करे भी क्यों नहीं गिरिजा ने भी तो बहन होते हुए भी माँ का फ़र्ज़ निभाया था |अब  गिरिजा की आयु विवाह के योग्य थीं | वर की खोज आरम्भ हुई | बस यहीं  एक बार फिर समय ने अपना दाँव खेला | किताबी ज्ञान के अभाव के कारण  गिरिजा के जीवन की रूपरेखा कुछ इस तरह लिखी गई कि  बिना डिग्री के लड़की को कौन ब्याहे  | पिता के मन को बड़ी कचोट हुई , अपनी गलती का अहसास भी हुआ | रात-रात भर जागते -करवटें बदलते ,अपने आप को कोसते | सोचते, समय रहते चेत जाते तो यूँ बेटी के ब्याह को परेशान होना पड़ता | खैर जैसे-तैसे एक लड़का मिलापरिवार नामी था ,घर-वर तो अच्छा था पर व्यवसाय अनुकूल था | उनके परिवार में सब्जी बेचने का कार्य होता था | यह व्यवसाय उन लोगों ने क्यों अपनाया यह तो ज्ञात नहीं ,हाँ किन्तु लड़का गिरिजा की ही भाँति सरल था | सो विवाह के पश्चात दोनों की बनने लगी | लड़के के बड़े भाई का विवाह भी नहीं हो पा रहा था | उस घर में गिरिजा के कदम ऐसे पड़े कि बड़े बेटे का विवाह भी हो गया | गिरिजा ने तो अपनी सरलता से पहले ही सास-ससुर का दिल जीत लिया था किन्तु बड़े बेटे का विवाह होने से वे गिरिजा को शुभ कदम की मानने लगे | ठीक भी था | गिरिजा थीं ही ऐसी जहाँ रहती खुशियाँ बाँटती
सास-ससुर का व्यवहार गिरिजा के प्रति बहुत ही अच्छा था | गिरिजा की  नई जेठानी दसवीं पास थीं , बड़ा गुरुर था उसे , देखने में तो अत्यंत साधारण सी थीं , किन्तु दसवीं के सर्टिफिकट से  उसमें  अभिमान की बू आती थीं | वह गिरिजा पर पूरा रौब जमाती थीं | संयुक्त परिवार में रहते हुए गिरिजा पूरे मनोयोग से अपने कर्तव्यों का पालन करती , और जेठानी अपने | वह गिरिजा को नीचा दिखाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती | यथा समय दोनों ने संतानों को जन्म दिया | गिरिजा के तीन बेटे और एक बेटी एवं जेठानी ने दो बेटे एवं एक बेटी हुई | सभी हमउम्र थे ,बस गिरिजा का सबसे छोटा बेटा ही अकेला किन्तु सब भाई- बहनों का लाडला था |
समय का चक्र तो चलता रहता है, वो तो किसी के सुख से सुखी होता है किसी के दुःख से दुखी | ही किसी के लिए रुकता है |गिरिजा  के सास-ससुर अब इस दुनिया में नहीं थे | दोनों भाइयों ने साथ ही रहने का संकल्प कर संयुक्त परिवार को बिखरने नहीं दिया | सास-ससुर के जाने के बाद तो जेठानी ने पूरे घर पर तो कब्जा कर लिया साथ ही गिरिजा पर भी|   गिरिजा तो जैसे उसकी दासी थीं | गिरिजा को  यह बात नागवार गुजरती किन्तु पति का मान रखते हुए सब सह जाती| आने -जाने वालों के सामने जेठानी अपनी पढ़ाई का रौब झाड़ती ,गिरिजा को पगली कहती | कहते है कि ईश्वर एक हाथ से लेता है तो सौ हाथों से देता है | गिरिजा के चारों बच्चे सुंदर एवं सभ्य थे | उच्च शिक्षा प्राप्त कर नौकरी में उच्च पदों पर आसीन थे | वहीँ दूसरी और जेठानी के बड़े बेटे ने लगभग तीस वर्ष की आयु में सी  की डिग्री ली और दूसरे बेटे ने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ आवारागर्दी शुरू कर दी | जेठ जी ने उस समझा बुझाकर अपने ही व्यवसाय (सब्जी बेचने के ) में लगा लिया | फिर भी जेठानी की अकड़ नहीं गई | वह अपने बेटों के लिए सुंदर-सुशील वधुओं की तलाश करने लगी तो दूसरी ओर गिरिजा को बच्चों के ब्याह में तनिक भी समस्या नहीं आई | गिरिजा की तीनो बहुएँ -सुंदर-सुशील एवं सुघड़ थीं | दामाद भी बड़े  खानदान से था |
जेठानी तो पहले से ही जली-भुनी रहती थीं ,  उससे गिरिजा की खुशियाँ बर्दाश्त ही नहीं होती थीं | अब तो वह गिरिजा को खुले आम पगली कहकर बुलाती थींगिरिजाकी बहुएँ अपने ससुर के भ्रातृ प्रेम के कारण चुप रह जाती थीं | जेठानी की दोनों बहुएँ उसके इस व्यवहार से भलीभाँति परिचित थीं |उन्हें भी अपनी सास का चाची सास के प्रति  रवैया बिलकुल नहीं सुहाता था | धीरे-धीरे उस परिवार में कलह शुरू हो गई | दो चूल्हे हो गए | गिरिजा की बहुओं ने संयुक्त परिवार की परंपरा को कायम रखा | जेठानी का घर तीन टुकड़ों में बँट गया | उनकी बहुओं ने अपनी सास से मुँह मोड़ लिया | जिस कारण वह अभिमान करती थी वह चूर-चूर हो रहा था |
हाँ एक बात की चर्चा करना  तो मैं भूल ही गई कि मेरे पति गिरिजा जीजी के प्रिय भाई हैं | हालाँकि उनके बच्चों की आयु लगभग  हमारे ही सामान है किन्तु वे हमें पूरा मान-सम्मान देती हैं | एक दिन मैं और मेरे पति उनके घर के समीप से जा रहे थे ,  मेरे पति ने  कहा " चलो आज गिरिजा जीजी से मिलकर चलते हैं|" हम वहाँ पहुँचे तो, जैसा कि कालोनियों में महिलाएँ करती हैं ,कुछ वैसी ही चर्चा चल रही थी| धूप  सेंकती ,मूंगफली खाती गपिया रहीं थी | चर्चा का विषय गिरिजा जीजी और उनकी जेठानी थी | एक महिला कह रही थी कि " बड़ी कहती थी पगली है  -पगली है | मुझे तो वही पगली लगती है |" दूसरी ने कहा कि अरे हाँ -"बड़ा बनती है , देख लिया था उसके बेटे के ब्याह में कोई भाई खड़ा था भात के समय "
तीसरी कहती -" मुझे तो गिरिजा के बड़े बेटे की शादी के बाद पता लगा था कि उसके भाई बहन सौतेले हैँ | सारे भाई -बहन कैसे जान छिडकते हैँ गिरिजा पर कि कोई जान ही नहीं सका कि वे सगे नहीं हैँ "| "और तो और उसके चचेरे -ममेरे दूर के भाई भी द्वार पर खड़े थे " एक ने कहा | "गिरिजा है ही ऐसी सरल तभी तो परायी जाइयों को भी अपना बना लिया सब खूब मान करती हैं उसका |" उन महिलाओं से मेरा भी परिचय रहा हैं सो मैं भी सबको नमस्ते करके उनके साथ बैठ गई |
जीजी की जेठानी घर के बाहर खटिया डालकर लेटी सारी बात-चीत सुन रही थीं | उनका मन आत्मग्लानि से भर उठा | पश्चात्ताप के आँसू झर रहे थे | मन में उठते विचारों ने तुरंत निर्णय लिया कि गिरिजा के पास जाया जाए | अपने बूढ़े तन-मन को लगभग खीँचती वे आँगन में धूप सेंकती गिरिजा जीजी के पास पहुँची | अपने स्वभाव के अनुकूल जीजी ने उन्हें सम्मान पूर्वक बिठाया | बैठते ही जेठानी प्रायश्चित कर कहने लगी कि "गिरिजा मैं तुम्हें पगली कहती थी ,पर सच में तो मैं ही पगली हूँ जो थोड़े  से किताबी ज्ञान के कारण अभिमान कर बैठी |" सरलहृदय जीजी बोल उठी " जीजी पढाई -लिखाई का महत्त्व तो मैंने अपने ब्याह में आयी कठिनाइयों से जाना था तथा आपके आने से यह और दृढ हो गया था | "मैंने तभी संकल्प कर लिया था कि अपने बच्चों को खूब पढ़ाऊंगी" | जेठानी बोल उठी " गिरिजा तुमने तो विद्या के महत्त्व को बहुत पहले समझ लिया था किन्तु मैंने  रिश्तों को निभाने का तथा जीवन का पाठ आज पढ़ा है | हो सके तो मुझे क्षमा कर देना मेरी छोटी बहन "|मैं और मेरे पति चुपचाप खड़े दो बहनों का वार्तालाप सुन रहे थे | और सोच रहे थे कि सचमुच पगली कौन ?

हमारी तन्द्रा तब भंग हुई जब जीजी की छोटी बहू ने हमारे पैर छूते हुए पूछा " अरे -मामाजी-मामीजी आप कब आये "|